छटे गुणस्थान में मर कर जीव की गति क्या होती है ?
छठे गुणस्थान (प्रमत्त सम्यग्दृष्टि गुणस्थान) में मरने वाले जीव की आगे कोई भी गति हो सकती है – चारों गतियों में से:
- देव गति
- मनुष्य गति
- तिर्यंच गति (पशु‑पक्षी, कीटक आदि)
- नरक गति
क्यों?
- छठा गुणस्थान अभी भी राग‑द्वेष, कषाय और प्रमाद (लापरवाही) से युक्त होता है।
- सम्यक्दर्शन तो है, परंतु व्रत, संयम, साधना में ढील के कारण शुभ‑अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों का बंध चल रहा होता है।
- इसीलिए यहाँ से मरते समय जीव के संचित कर्मानुसार किसी भी एक गति का उदय हो सकता है।
साधारण रूप से:
- यदि शुभ परिणाम, मंद कषाय अधिक हैं तो देव/मनुष्य गति की संभावना बढ़ती है।
- यदि अशुभ परिणाम, तीव्र कषाय अधिक हैं तो तिर्यंच या नरक गति भी हो सकती है।
यह समझ दोनों परंपराओं (दिगंबर और श्वेतांबर) में मूलतः समान है कि छठे गुणस्थान तक जीव अभी संसार में ही घूमने योग्य है, मोक्षमार्ग की निश्चितता आठवें‑उपर के गुणस्थानों से मानी जाती है।