सातवें गुणस्थान में मरने वाले की गति क्या होती है ?
सातवें गुणस्थान (अप्रमत्त‑संयत) में मरने वाले निश्चित रूप से देवगति को प्राप्त होते हैं।
जैन सिद्धांत के अनुसार:
- ७वें गुणस्थान तक पहुँचा जीव केवल मनुष्य योनि में होता है।
- यदि वह वहीं पर मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तो उसकी अगली गति हमेशा देवगति होती है।
- विशेष रूप से उसे चौथे स्वर्ग (चतुर्थ देव-स्थान) में जन्म मिलता है।
- ऐसी अवस्था में नरक, तिर्यंच या पुनः मनुष्य गति नहीं मिलती।
संक्षेप में: सातवें गुणस्थान में मरने वाले की गति — देव गति (चौथा स्वर्ग)।