पर पंचम काल में सातवें गुणस्थान से ऊपर नहीं जा सकते ?
हाँ – वर्तमान पंचम काल में मनुष्य जीव सातवें गुणस्थान से ऊपर नहीं जा सकता।
संक्षेप में परम्परागत सिद्धान्त:
- पंचम काल (वर्तमान युग)
- इस काल में मनुष्य जीव के लिए केवल सातवें गुणस्थान (अप्रमत्तसंयत) तक ही सम्भावना मानी गई है। - इसके ऊपर के गुणस्थान (8 से 14) के लिए जो अत्यन्त उच्च साधना, क्षपक-श्रेणी, शुक्लध्यान, केवलज्ञान आदि चाहिए, वे इस काल के मनुष्य में नहीं होते।
- कौन–कौन से गुणस्थान मनुष्य को सम्भव हैं?
जैनाचार्यों के मत से पंचम काल में – - श्रावक–श्राविका: अधिकतम 5वाँ गुणस्थान (देशविरत / व्रताव्रत) - दिगम्बर मुनि: 6वाँ (प्रमत्तसंयत) और 7वाँ (अप्रमत्तसंयत) - 8वाँ और उससे ऊपर: मनुष्य के लिए इस पंचम काल में नहीं।
एक प्रसिद्ध जिज्ञासा–समाधान में स्पष्ट कहा गया है कि पंचम काल में मनुष्यों में केवल आरम्भ के सात गुणस्थान ही सम्भव हैं, उनमें भी 6–7वाँ केवल मुनिराज को होता है, श्रावक–श्राविका 5वें तक ही अधिकारी हैं। ( encyclopediaofjainism.com)
- देव आदि की बात
- प्रश्न आम तौर पर “मनुष्य” के सन्दर्भ में पूछा जाता है। - देवगति के उच्च जीवों को 8–12 आदि गुणस्थान भी हो सकते हैं; यह पंचम काल की मनुष्य–मर्यादा से अलग विषय है।
- कारण क्या है?
- पंचम काल को धर्म–क्रमशः ह्रास वाला युग कहा गया है। - ऐसी घोर प्रमाद, हिंसा, मोह और अल्प आयु–बल की स्थिति में - न तो क्षपक–श्रेणी, - न केवलज्ञान, - न तीर्थंकरत्व – इनमें से कोई भी मनुष्य के लिए वर्तमान युग में सम्भव नहीं माना गया; इसलिए 8–14वें गुणस्थान भी नहीं।
इसलिए आपके वाक्य का सही रूप यह होगा: “पंचम काल में मनुष्य जीव सातवें गुणस्थान से ऊपर नहीं जा सकता।”