क्या पंचम काल में कोई केवली नाम बंध कर सकता है ?
नहीं, पंचम काल में कोई भी जीव केवली नाम कर्म का नया बन्ध नहीं कर सकता।
संक्षिप में कारण:
- काल-विभाजन के अनुसार
- 1, 2, 3, 4 आरा (उत्सर्पिणी/अवसर्पिणी के मध्य भागों) में ही उच्चतम आध्यात्मिक अवस्थाएँ (तीर्थंकर, चक्रवर्ती, वासुदेव, प्रतिवासुदेव, बलभद्र, केवली आदि) के विशेष नामकर्मों का बन्ध होता है। - पंचम आरा धर्म-क्षय वाला, अत्यन्त हीन काल माना गया है; इसमें - न तीर्थंकर उत्पन्न होते हैं, - न चक्रवर्ती, - और न ही नये केवली नाम कर्म बन्ध करने की पात्रता बचती है।
- गुणस्थान की सीमा
पंचम काल में अधिकांश जीव अधिक से अधिक निम्न गुणस्थानों (4–5 तक) में ही विचर सकते हैं; केवलीत्व के लिए 12वें गुणस्थान (क्षपक श्रेणी) तक की उन्नति चाहिए, जो इस काल में संभव नहीं रखी गई है। जब वह अवस्था ही उपलब्ध नहीं, तो उसके लिए आवश्यक केवली-नामकर्म का नया बन्ध भी नहीं हो सकता।
- दिगम्बर–श्वेताम्बर दोनों मतों में
काल-विभाजन और पंचम काल की आध्यात्मिक हीनता का सिद्धान्त दोनों परम्पराओं में स्वीकार है; इसलिए व्यवहारिक रूप से दोनों ही मानते हैं कि पंचम काल में न नया केवली जन्मेगा, न केवली नाम कर्म का बन्ध होगा।
अर्थात्: पंचम काल में कोई भी जीव केवली नाम बन्ध नहीं कर सकता; केवलीत्व का मार्ग अभी बंद माना गया है, केवल श्रावक–श्रमण धर्म और मोक्ष के हेतु सम्यक् दर्शन–ज्ञान–चरित्र की तैयारी ही सम्भव है।