Daya kitne prakar ke hote hain.
जैन दृष्टि से “दया” को आम तौर पर दो मुख्य रूपों में समझाया जाता है:
1. जीव‑दया (सभी जीवों पर दया)
- हर प्रकार के जीव (एक इंद्रिय से लेकर पाँच इंद्रिय तक) को कष्ट न देना।
- अहिंसा का पालन, शाकाहार, सावधानी से चलना‑फिरना, पानी छानकर पीना, कीट‑पतंगों को अनावश्यक न मारना आदि – ये सब जीव‑दया के रूप हैं।
- मतलब: “मैं किसी भी जीव को जानबूझ कर दुःख नहीं दूँ।”
2. धर्म‑दया (धर्म से की गई दया)
- किसी जीव के केवल शारीरिक दुख को नहीं, बल्कि उसके आध्यात्मिक कल्याण का ध्यान रखना।
- जैसे:
- मतलब: “मैं दूसरे जीव की आत्मा का कल्याण चाहूँ और उसे सही मार्ग की प्रेरणा दूँ।”
संक्षेप में:
- जीव‑दया = हिंसा न करना, सब पर करुणा रखना।
- धर्म‑दया = धर्म के माध्यम से जीव का सच्चा भला करना।