क्या अर्जीका और श्रविका पाँचवे गुणस्थान तक ही जा सकती हैं पंचम काल में
नहीं, ऐसा कहना सही नहीं है कि आर्जिका (आर्यिका) और श्राविका पंचम काल में केवल पाँचवें गुणस्थान तक ही जा सकती हैं। थोड़ा साफ‑साफ समझते हैं:
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१. गुणस्थान का आधार “व्रत और कषाय” हैं, काल (आरा) नहीं
१४ गुणस्थान आत्मा की आन्तरिक शुद्धि की सीढ़ियाँ हैं। इनका निर्णय आत्मा की स्थिति, व्रत और कषाय से होता है, न कि सीधे‑सीधे “काल” (पहला, दूसरा, पाँचवां आरा आदि) से।
हाँ, शास्त्रों में यह अवश्य कहा गया है कि पंचम काल में केवलज्ञान और तीर्थंकर आदि नहीं होते, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि पाँचवे गुणस्थान से आगे कोई नहीं जा सकता।
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२. श्राविका की सीमा – प्रायः ५वाँ गुणस्थान
- ५वाँ गुणस्थान = देशव्रत / देशविरत
- गृहस्थ अवस्था (श्रावक‑श्राविका) के साथ पूर्ण महाव्रत नहीं हो सकते, इसलिए वे गुणस्थान की दृष्टि से सामान्यतः पाँचवे गुणस्थान (देशविरत) तक ही माने जाते हैं।
इसलिए:
- श्राविका – सामान्य स्थिति में ५वें गुणस्थान तक।
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३. आर्यिका (दीक्षित साध्वी) की स्थिति
आर्यिका/साध्वी तो महाव्रतधारी दिगंबर साध्वी / श्रमणी हैं (या श्वेतांबर परम्परा में साध्वी) – इनके पास पूर्ण संयम होता है, इसलिए:
- वे ६वें गुणस्थान (प्रमत्त‑संयत) पर अवश्य रह सकती हैं,
- और आन्तरिक शुद्धि बढ़ने पर आगे के गुणस्थान भी (७, ८, ९… इत्यादि) सिद्धान्ततः सम्भव हैं।
अर्थात्, आर्यिका को केवल पाँचवें गुणस्थान तक सीमित मानना शास्त्रानुकूल नहीं है। ५वाँ तो गृहस्थ देशव्रती की सीमा है; आर्यिका तो संन्यस्त, महाव्रतधारी होती हैं।
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४. दिगंबर और श्वेतांबर मत में थोड़ा अंतर
- दिगंबर मत
- श्वेतांबर मत
परन्तु दोनों परम्पराओं में यह नहीं कहा गया कि पंचम काल में आर्जिका केवल ५वें गुणस्थान तक ही जा सकती है।
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संक्षेप उत्तर
- श्राविका (गृहस्थ स्त्री) – व्रत‑व्यवस्था के कारण, सामान्यतः ५वें गुणस्थान (देशविरत) तक।
- आर्यिका / साध्वी – महाव्रतधारी होने से, ५वें से आगे, कम से कम ६वें गुणस्थान तक, और आगे भी सिद्धान्ततः मार्ग खुला है।
- पंचम काल होने से वे केवल पाँचवें गुणस्थान तक सीमित हो जाएँ – ऐसा जैन सिद्धान्त नहीं कहता।