वज्रवृषभनाराच संहनन क्या होता है ?
जैन दर्शन में संहनन (Saṃhanana) का मतलब है – देह की हड्डियों (अस्थियों) का जोड़ और मजबूती किस प्रकार की है। कुल मिलाकर 6 प्रकार के संहनन बताए गए हैं, जिनमें सबसे श्रेष्ठ – वज्र-वृषभ-नाराच संहनन है।
इसे तीन शब्दों में बाँटकर समझें:
- वज्र – हीरे जैसा मजबूत
- वृषभ – बैल की तरह शक्तिशाली-सहनशील
- नाराच – बाण / तीर जैसा कठोर और सघन जोड़
अर्थ: वज्र-वृषभ-नाराच संहनन वाला शरीर ऐसा होता है जिसकी हड्डियाँ
- अत्यन्त कठोर,
- बहुत मज़बूत,
- और जोड़ (जॉइंट्स) इतने सघन होते हैं कि उन्हें सामान्य साधारण साधनों से काटा/तोड़ा नहीं जा सकता।
जैन ग्रंथों के अनुसार:
- तीर्थंकर, अरिहंत, केवली आदि महापुरुषों को ऐसा ही अत्युत्तम संहनन मिलता है।
- इसी कारण वे अत्यन्त दीर्घकाल तक कठिन तप, ध्यान, उपवास, कष्ट-सहन कर सकते हैं, और उनके शरीर पर घोर उपसर्ग (कष्ट) भी आ जाएँ तो भी देह तुरंत नष्ट नहीं होती।
संक्षेप में: वज्रवृषभनाराच संहनन = सर्वोच्च प्रकार का अस्थि-संरचना जो केवल अतिशय विशिष्ट पुण्य से और बहुत विरले जीवों को ही मिलता है, और मोक्ष-मार्ग पर विशेष सहायक माना गया है।