क्या वज्रवृषभनाराच संहनन के बिना मोक्ष संभव नहीं है ?
संक्षिप्त उत्तर: नहीं, वज्र‑वृषभ‑नाराच संहनन के बिना भी मोक्ष संभव है।
थोड़ा विस्तार से, सरल भाषा में:
1. संहनन (देह की कड़कता) क्या है?
जैन दर्शन में जीव के शरीर की मजबूती / कड़कता के 6 प्रकार बताए जाते हैं, जिनमें से तीन मुख्य कड़े प्रकार हैं:- वज्र संहनन
- वृषभ संहनन
- नाराच संहनन
जो तीर्थंकर आदि महापुरुष बनते हैं, उनमें प्रायः वज्र‑वृषभ‑नाराच जैसे अत्यन्त दृढ़ संहनन बताए जाते हैं, ताकि वे तीव्र तप, कष्ट सहन आदि कर सकें।
2. मोक्ष के लिए क्या अनिवार्य है?
शास्त्रों के अनुसार मोक्ष के लिए मुख्य कारण हैं:- सम्यक दर्शन
- सम्यक ज्ञान
- सम्यक चरित्र (व्रत, संयम, कषाय क्षय/उपशम)
इनके साथ जब घातिया कर्म पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं, तो जीव सिद्ध हो जाता है – यही मोक्ष है। शरीर (शरीर की बनावट, संहनन आदि) उपादान कारण नहीं, केवल सहायक / निमित्त होते हैं।
3. संहनन की भूमिका क्या है?
- तीर्थंकर, कीवलज्ञानी महापुरुष आदि के लिए विशेष प्रकार के संहनन (जैसे वज्र‑वृषभ‑नाराच) का वर्णन है, जिससे वे कठिनतम तप और दु:ख सहन कर सकें।
- परंतु प्रत्येक मोक्षी जीव के लिए ऐसा संहनन होना आवश्यक नहीं बताया गया है।
- अनादिकाल से अनन्त जीवों ने मोक्ष पाया है; सभी के लिए एक ही विशेष संहनन को अनिवार्य नहीं माना गया।
4. निष्कर्ष
- मोक्ष का मूल कारण आत्मा की शुद्धि और कर्मों का नाश है।
- संहनन केवल शरीर का गुण है, आत्मा का नहीं।
- इसलिए यह कहना कि “वज्र‑वृषभ‑नाराच संहनन के बिना मोक्ष हो ही नहीं सकता” — शास्त्रीय दृष्टि से ठीक नहीं है।
साधक के लिए मुख्य ज़ोर सम्यक श्रद्धा, सम्यक ज्ञान, व्रत, तप, संयम, कषाय‑क्षय पर ही है, न कि किसी विशेष देह‑संरचना पर।