भगवान महावीर ने स्त्री को दीक्षा देने से क्यूँ मन कर दिया था ?
जैन आगमों और प्रामाणिक चरित्र‑ग्रंथों में कहीं भी यह नहीं मिलता कि “भगवान महावीर ने स्त्रियों को दीक्षा देने से मना कर दिया था।”
यह धारणा सामान्यत: एक गलतफहमी या बाद की लोक‑कथा है, शास्त्रीय तथ्य नहीं।
संक्षेप में स्पष्ट बिंदु:
- महावीर का उपदेश सबके लिए समान
- भगवान महावीर ने चारों वर्ग (साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका) को धर्म मार्ग बताया। - आगमों में उनकी शिष्य परंपरा में गणधर, मुनि, साध्वी, श्रावक, श्राविका – सभी का वर्णन है। - श्वेतांबर परंपरा में तो चतुरांग संघ (मुनि + आर्यिका/साध्वी + श्रावक + श्राविका) स्पष्ट रूप से महावीर के समय से माना जाता है।
- स्त्री‑संयम / साध्वी‑संस्था का अस्तित्व
- श्वेतांबर परंपरा में: महावीर काल से ही बड़ी‑संख्या में साध्वियाँ मानी गई हैं, जिनमें चेलना आदि के प्रसंग आते हैं। - दिगंबर परंपरा में भी: - स्त्रियों के लिए आर्यिका‑संयम / आर्यिका‑दीक्षा का मार्ग है। - doctrinal भेद यह है कि दिगंबर मत के अनुसार नग्न मुनि‑दीक्षा केवल पुरुषों के लिए है; स्त्रियाँ वस्त्र सहित आर्यिका‑दीक्षा लेती हैं। - परन्तु यह “दीक्षा नहीं देना” नहीं, बल्कि दीक्षा का स्वरूप अलग होना है।
- “महावीर ने स्त्री को दीक्षा देने से मना कर दिया” – ऐसा कोई आगमिक प्रमाण नहीं
- न आचारांग, न सूत्रकृतांग, न उत्तराध्ययन आदि में ऐसा प्रसंग है। - कुछ लोग दिगंबर सिद्धांत – “स्त्री शरीर से अंतिम मोक्ष नहीं, आगे पुरुष जन्म लेकर मोक्ष” – को गलत समझकर यह कह देते हैं कि “महावीर ने दीक्षा नहीं दी होगी”; पर यह उनकी व्यक्तिगत व्याख्या है, शास्त्र‑सिद्ध बात नहीं। - दोनों परंपराएँ मानती हैं कि स्त्री भी कठोर संयम, व्रत, तप, अध्ययन कर सकती है और करती है।
- परंपरा‑भेद स्पष्ट रूप से
- श्वेतांबर: - स्त्रियाँ साध्वी‑दीक्षा लेकर उसी प्रकार महाव्रत पाल सकती हैं, और अभी के स्त्री‑शरीर से ही मोक्ष संभव माना जाता है। - दिगंबर: - पूर्ण नग्न मुनि‑दीक्षा केवल पुरुषों के लिए; - स्त्रियों के लिए आर्यिका‑दीक्षा (श्वेत वस्त्र, महाव्रत, अत्यन्त संयम)। - सिद्धान्ततः, मोक्ष के लिए आगे किसी पुरुष जन्म की आवश्यकता मानी जाती है; पर अभी भी स्त्री‑शरीर से अत्युच्च आध्यात्मिक अवस्थाएँ प्राप्त मानी गई हैं।
- व्यावहारिक निष्कर्ष
- भगवान महावीर ने कभी किसी वर्ग (स्त्री या पुरुष) को धर्म से वंचित करने की शिक्षा नहीं दी। - उन्होंने सबको – जाति, लिंग, स्थिति से परे – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का मार्ग बताया। - “नारी‑दीक्षा निषेध” जैसा वाक्य, जैन धर्म के अनेकांत और समता‑भाव के विरुद्ध है, इसलिए इसे आगमिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता।
इस विषय पर जैन धर्म में स्त्री और संयम के बारे में सरल परिचय के लिए आप यहाँ पढ़ सकते हैं