भगवान मलिनाथ स्त्री होने के बाद भी तीर्थंकर कैसे बन गए ?
भगवान मल्लिनाथ के बारे में बात करते समय सबसे ज़रूरी है – दोनों परम्पराओं (दिगम्बर और श्वेताम्बर) की मान्यताओं को साफ़‑साफ़ समझना।
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1. दिगम्बर परम्परा की मान्यता
दिगम्बर आगम‑परम्परा के अनुसार:
- वर्तमान चौबीसी के सभी 24 तीर्थंकर पुरुष माने जाते हैं।
- इसलिए दिगम्बर मत में भगवान मल्लिनाथ भी पुरुष ही थे, स्त्री नहीं।
- दिगम्बर आचार्यों के अनुसार –
इसलिए दिगम्बर मत में यह प्रश्न ही नहीं उठता कि “स्त्री होकर तीर्थंकर कैसे बने”, क्योंकि उनके अनुसार मल्लिनाथ भगवान स्त्री थे ही नहीं, वे आरम्भ से पुरुष ही थे।
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2. श्वेताम्बर परम्परा की मान्यता
श्वेताम्बर आगम‑परम्परा के अनुसार:
- 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ ने अन्तिम जन्म में स्त्री देह धारण की – वे राजकुमारी मल्लि के रूप में वर्णित हैं।
- श्वेताम्बर मत मानता है कि
- तीर्थंकर पद का कारण है –
इसलिए श्वेताम्बर मत में:
- भले ही मल्लिनाथ भगवान ने अंतिम जन्म में स्त्री शरीर पाया,
- परन्तु उस आत्मा ने तो बहुत पहले ही तीर्थंकर‑नाम‑कर्म बाँध लिया था,
- वही कर्म परिपक्व होने पर उन्हें तीर्थंकर बनाता है – शरीर स्त्री हो या पुरुष, इससे आत्मा की सिद्धि में कोई बाधा नहीं मानी जाती।
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3. “स्त्री होकर भी तीर्थंकर कैसे?” – जैन दृष्टि से सरल उत्तर
जैन दर्शन के मूल सिद्धान्त के अनुसार:
- आत्मा = चेतन तत्त्व, लिंग‑रहित
- देह (शरीर) = कर्म का फल, बदलता रहता है
- मोक्ष / केवलज्ञान / तीर्थंकर पद –
- आत्मा की शुद्धता और कर्मों की स्थिति पर निर्भर हैं, - न कि शरीर के रूप, रंग, जाति, कुल, देश, स्त्री‑पुरुष होने पर।
इसलिए:
- श्वेताम्बर परम्परा:
- दिगम्बर परम्परा:
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सार
- दिगम्बर मत: मल्लिनाथ भगवान स्त्री नहीं, पुरुष तीर्थंकर हैं – अतः “स्त्री होकर भी” वाला प्रश्न वहाँ लागू नहीं होता।
- श्वेताम्बर मत: मल्लिनाथ भगवान ने स्त्री देह में रहकर भी तीर्थंकर पद प्राप्त किया, क्योंकि
इस प्रकार, “स्त्री होकर भी तीर्थंकर कैसे बने?” – जवाब है: आत्मा की सिद्धि कर्म और पुरुषार्थ पर निर्भर है, देह के लिंग पर नहीं।