Logassa in sanksrit
Logassa मूल रूप से संस्कृत नहीं, बल्कि अर्धमागधी प्राकृत में रचा गया स्तोत्र है (श्वेताम्बर परम्परा में)। इसलिए इसका “असली” पाठ प्राकृत में ही माना जाता है, न कि संस्कृत में।
- मूल प्राकृत (देवनागरी लिपि में)
लोगस्स उज्जोअ-गरे, धम्म-तित्थ-यरे जिणे अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥
उसभ-मजिअं च वंदे, संभव-मभिणंदणं च सुमइं च पउम-प्पहं सुपासं, जिणं च चंद-प्पहं वंदे ॥२॥
सुविहिं च पुप्फ-दंतं, सीअल-सिज्जंस-वासु-पुज्जं च विमल-मणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ॥३॥
कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणि-सुव्वयं नमि-जिणं च वंदामि रिट्ठ-नेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥
एवं मए अभिथुआ, विहुय-रय-मला पहीण-जर-मरणा चउ-वीसं पि जिणवरा, तित्थ-यरा मे पसीयंतु ॥५॥
कित्तिय-वंदिय-महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा आरुग्ग-बोहि-लाभं, समाहि-वर-मुत्तमं-दिंतु ॥६॥
चंदेसु निम्मल-यरा, आइच्चेसु अहियं पयास-यरा सागर-वर-गंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥७॥
पूरा पाठ और सरल अर्थ आप यहाँ देख सकते हैं:
- संस्कृत के बारे में स्पष्ट बात
- यह स्तोत्र प्राकृत का है, इसलिए “Logassa in Sanskrit” के नाम से कोई अलग प्रामाणिक संस्कृत मूल-पाठ आगमों में नहीं मिलता। - हाँ, विचार वही रखते हुए संस्कृत में बने अलग-अलग चतुर्विंशति‑स्तवन (२४ तीर्थंकरों की स्तुति) मिलते हैं, पर वे मूल लोगस्स सूत्र नहीं, बल्कि अलग संस्कृत रचनाएँ हैं। - दिगम्बर परम्परा में २४ तीर्थंकर स्तवन के लिए प्रामुख्य से संस्कृत “चतुर्विंशति‑स्तोत्र” आदि का उपयोग होता है, पर भाव वही है – सभी २४ तीर्थंकरों की वन्दना।
- सरल भाव (परम्परागत अर्थ)
बहुत संक्षेप में, लोगस्स का अर्थ है: - मैं उन अरिहन्तों और २४ तीर्थंकरों की वन्दना करता हूँ, जिन्होंने धर्म‑तीर्थ स्थापित किया, सम्यक् ज्ञान‑दर्शन पाया और लोक को मोक्ष‑मार्ग बताया। - उनके गुणों का स्तवन करके मैं अपने पापों का क्षय, रोग‑शोक से रक्षा, सम्यक् दर्शन और उत्तम समाधि की प्राप्ति की प्रार्थना करता हूँ। - जो सिद्ध भगवान् संसार से सर्वथा तर चुके हैं, वे मुझे भी सिद्ध पद की सिद्धि प्रदान करने के कारण‑भूत बनें।
संक्षेप:
- “Logassa” का असली पाठ प्राकृत में ही मान्य है।
- यदि आप चाहें तो मैं इसके प्रत्येक पद का बहुत सरल अर्थ भी दे सकता हूँ, पर वह भी प्राकृत मूल पर ही आधारित होगा, न कि किसी “संस्कृत संस्करण” पर।