Mahaveer shasan jainagam granthmala
“महावीर शासन जैनागम ग्रन्थमाला” नाम से आम तौर पर वह पुस्तक-सीरीज़ (series) समझी जाती है, जिसमें जैन आगमों को एक संगठित रूप में छापा गया है। सरल शब्दों में:
- महावीर शासन – भगवान महावीर का उपदेश परम्परा / उनका धर्म-शासन
- जैनागम – जैनों के प्रामाणिक शास्त्र (आगम)
- ग्रन्थमाला – ग्रन्थों की क्रमबद्ध श्रृंखला (set / collection)
ऐसी “जैनागम ग्रन्थमाला” में सामान्यतः होता है:
- मूल प्राकृत/अर्धमागधी भाषा का पाठ
- साथ में किसी आधुनिक भाषा (जैसे हिन्दी/गुजराती) का अर्थ / अनुवाद
- कभी–कभी संक्षिप्त टीका या व्याख्या, ताकि साधारण पाठक भी समझ सके
- इनका उपयोग पाठशाला, स्वाध्याय, उपासना गृहों में आगम-अध्ययन के लिए होता है।
परम्परा के अनुसार अंतर
- श्वेताम्बर परम्परा में “जैनागम” से मुख्यतः ४५ आगम (अथवा उनके स्वीकृत समूह) समझे जाते हैं, इसलिए उनकी ग्रन्थमालाओं में प्रायः इन्हीं आगमों के संस्करण मिलते हैं।
- दिगम्बर परम्परा में मूल आगम नष्ट माने जाते हैं; वहाँ षट्खण्डागम, कसमापाहुडा आदि वाङ्मय को प्रामाणिक माना जाता है, अतः दिगम्बर ग्रन्थमालाएँ अलग प्रकार से तैयार होती हैं और उन्हें प्रायः “आगम” शब्द की बजाय “आगम-साहित्य / मूलग्रन्थ” आदि कहा जाता है।
आप जो “Mahaveer shasan jainagam granthmala” लिख रहे हैं, वह प्रायः किसी विशेष ट्रस्ट/संस्था द्वारा प्रकाशित जैन आगमों की सीरीज़ का नाम है – जो पाठशालाओं और घरों में स्वाध्याय के लिए रखी जाती है। यदि आप इसे खरीदना या डाउनलोड करना चाह रहे हैं, तो अपने स्थानीय जैन पुस्तक विक्रेता, जैन संघ/मन्दिर, या अपने आचार्य/समाज से पूछना सबसे ठीक रहेगा, क्योंकि प्रकाशक–नाम व संस्करण नगर‑नगर में बदल जाते हैं।