Ras parityag tap
“Ras Parityag Tap” – आसान भाषा में समझें
1. Ras Parityag क्या है? Jain धर्म में तप (तपस्या) के दो प्रकार बताए गए हैं:
- बाह्य तप (शरीर से किया जाने वाला)
- आभ्यंतर तप (अंतर से/भाव से किया जाने वाला)
बाह्य तप के 6 प्रकार माने गए हैं, उनमें से एक है “Ras Parityag Tap”।
Ras Parityag Tap का सरल अर्थ: जिस खाने‑पीने की चीज़ से हमें बहुत स्वाद, मजा, लगाव या आदत है, उसे जानबूझकर छोड़ देना – यही रस परित्याग तप है। यानी स्वाद का त्याग / रुचिकर पदार्थों का त्याग।
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2. इसमें क्या छोड़ा जाता है? परंपरा में सामान्य उदाहरण इस प्रकार बताए जाते हैं (केवल समझ के लिए):
- दूध, दही, घी, मक्खन
- मिठाई, शीतल पेय, बहुत मसालेदार या अत्यन्त प्रिय व्यंजन
- कोई भी चीज़ जो “मुझे बहुत पसंद है” – उसे नियम करके छोड़ना
यह त्याग दो तरह से हो सकता है:
- आंशिक: कुछ समय के लिए, या कुछ विशेष वस्तु छोड़ना
- पूर्ण: लम्बे समय के लिए या जीवन भर किसी रस का त्याग
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3. Ras Parityag Tap का महत्व (आध्यात्मिक दृष्टि से)
- राग‑द्वेष कम करना:
- इन्द्रियों पर संयम:
- कर्म निर्जरा:
- साधना के लिए सहायक:
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4. गृहस्थ (श्रावक) कैसे कर सकते हैं?
गृहस्थ के लिए यह तप बहुत व्यावहारिक माना गया है, जैसे:
- नियम लेना कि:
ध्यान रहे:
- दिखावा, अहंकार के लिए नहीं,
- आत्मशुद्धि, संयम और विनम्रता के भाव से करना।
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5. साधु‑साध्वी के लिए
जिन साधु‑साध्वीजी आजीवन बहु‑प्रकार के रसों का त्याग करते हैं, उनका उद्देश्य:
- शरीर को केवल साधन मानना,
- स्वाद‑आसक्ति से दूर रहकर
- एकाग्रता, ध्यान, और निरंतर साधना को प्रबल करना।
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6. दिगम्बर और श्वेताम्बर परंपरा में
- दोनों परंपराओं में तप के सिद्धांत और बाह्य तपों की मुख्य सूची (जैसे अनशन, उनोदरी, रसपरित्याग आदि) का भाव एक ही है।
- कुछ ग्रंथों में नाम/क्रम में थोड़े भेद मिल सकते हैं, पर
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संक्षेप में Ras Parityag Tap = अपने प्रिय स्वाद छोड़कर, जीभ की आसक्ति घटाना, मन को संयमी बनाना, और इस प्रकार आत्मा को शुद्ध करने का साधन।