Samayik ma rati kisne kari??
Samayik में "रति" (आनंद, लगाव) करने का तात्पर्य है—सम्यक भाव से समता में स्थिर होना। जैन धर्म में समवशरण या उपदेश में बताया गया है कि सम्यकदृष्टि साधक ही वास्तव में समता में "रति" (अनुरक्ति/आनंद) करता है। अर्थात, जिसने राग-द्वेष को छोड़कर आत्मा में स्थित होने का अभ्यास किया, वही सही अर्थ में समता में रति करता है।
इसलिए, जैन आगमों के अनुसार सम्यकदृष्टि साधक (जो सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान एवं सम्यकचारित्र से युक्त हो) ही समता में तथा समायिक साधना में "रति" करता है।