gandhar kon hote hai?
“Gandhar” (या “गणधर / गणधार”) जैन धर्म में किसे कहते हैं, इसे बहुत सरल शब्दों में समझें:
- गंधार कौन होते हैं?
- हर तीर्थंकर के मुख्य शिष्य को गंधार कहते हैं। - “गण + धार” = जो गण (संघ / समूह) को धारण व नेतृत्व करे। - ये तीर्थंकर भगवान की दिव्य ध्वनि (उपदेश) को पूरी तरह समझ कर बाकी साधुओं‑श्रावकों को समझाते हैं।
- उनकी प्रमुख भूमिका
- तीर्थंकर जब केवलज्ञान पाकर प्रवचन देते हैं, तो वह बहुत गहरा व सूक्ष्म होता है। - गंधार ही उसे अच्छे से समझकर - शिष्यों को बताते हैं, - प्रश्नों के उत्तर देते हैं, - और इन्हीं के आधार पर आगम / जैन शास्त्र व्यवस्थित हुए। - इसलिए उन्हें शृुत‑केवलि भी कहा जाता है (जिन्होंने भगवान का उपदेश पूर्ण रूप से सुना‑समझा हो)।
- उदाहरण
- भगवान महावीर के ११ गंधार थे, जिनमें इन्द्रभूति गौतम (गौतम स्वामी) प्रमुख माने जाते हैं। - महावीर स्वामी के सभी साधुओं को ११ समूहों में बाँटकर, हर समूह के ऊपर एक‑एक गंधार को रखा गया था।
- दिगंबर – श्वेतांबर परंपरा
- दोनों परंपराएँ मानती हैं कि - हर तीर्थंकर के मुख्य शिष्य गंधार कहलाते हैं, - और भगवान महावीर के ११ गंधार थे। - नामों की स्पेलिंग / उच्चारण में थोड़ा अंतर मिल सकता है, पर मूल भाव एक ही है – तीर्थंकर के प्रथम व प्रधान शिष्य = गंधार।
संक्षेप में: गंधार वे महान मुनि हैं जो तीर्थंकर के सीधा शिष्य बनकर, उनके उपदेश को समझते, सँभालते और पूरे जगत में फैलाते हैं।
गंधार के बारे में और पढ़ने के लिए यहाँ देख सकते हैं: