If a persIf a person has moderate desire and intense desire for moksh (nirveg) what does it mean. Within how many bhav's does such a soul get moksh? Take your time think and answer in detail
आप जिस बात की ओर इशारा कर रहे हैं, उसे जैन दर्शन की भाषा में ऐसे समझा जाता है:
- “मोक्ष की तीव्र इच्छा / समवेग (samveg) – संसार से ऊब (निर्वेद / nirved) और मोक्ष की तीव्र प्यास, कि स्वर्ग आदि भी आकर्षक न लगें, सिर्फ आत्म–मुक्ति ही प्रिय लगे।
- “मध्यम इच्छा” – मोक्ष की चाह है, श्रद्धा भी है, पर बीच‑बीच में संसार के सुख, मान–प्रतिष्ठा, रिश्ते, भोग आदि भी काफ़ी खींचते रहते हैं; वैराग्य स्थिर नहीं है।
आपका वाक्य “moderate desire and intense desire for moksh (nirveg)” को जैन शब्दों में साधारणतः ऐसे कहा जाएगा:
- मन्द / मध्यम समवेग + कुछ निर्वेद – मोक्ष की चाह तो है, पर संसार से गहरी ऊब नहीं जगी, बीच‑बीच में आसक्ति जागती रहती है।
- तीव्र समवेग + तीव्र निर्वेद – संसार की हर स्थिति (देव, मनुष्य, सुख, वैभव) भी तुच्छ लगे; बस बन्धन तोड़कर स्व–रूप में स्थित होना ही एकमात्र लक्ष्य लगे।
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1. ऐसे भाव का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
जिन ग्रंथों में सम्यग्दर्शन के लक्षण बताए हैं, वहाँ पाँच मुख्य भाव बताए जाते हैं:
- सम (शान्ति) – भीतर राग–द्वेष कम होना
- समveg (समवेग) – मोक्ष के लिए प्रबल उत्कंठा
- निर्वेद – संसार से गहरी विरक्ति; यह सब दुख–मय है, ऐसा अनुभव
- अनुकम्पा – सभी जीवों पर करुणा
- आस्तिक्य / आस्तिक्यभव – तत्वों, कर्म, मोक्ष आदि पर दृढ़ श्रद्धा
इसमें:
- तीव्र समवेग + निर्वेद का अर्थ है कि
- मध्यम इच्छा का मतलब है:
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2. “ऐसे जीव को कितने भव में मोक्ष होता है?” – शास्त्रीय दृष्टि
(क) मूल सिद्धान्त
जैन सिद्धान्त किसी जीव के “भाव की तीव्रता” के आधार पर कोई एक सर्वमान्य, निश्चित संख्या नहीं बाँधते, जैसे:
> “मध्यम समवेग वाला हमेशा इतने भव में, तीव्र वाला इतने भव में ही मोक्ष पाएगा।”
ऐसा सूत्र रूप में आगम में सीधे‑सीधे नहीं कहा गया, बल्कि यह कहा गया है:
- सम्यग्दर्शन के बाद मोक्ष निश्चित है
– जब सच्चा सम्यग्दर्शन (दर्शन–मोहनीय का क्षय / क्षयोपशम) हो जाता है, तब यह जीव कभी अनन्तकाल तक भटकता नहीं; उसका मोक्ष किसी सीमित भवों के भीतर निश्चित है।
- भवों की संख्या कई बातों पर निर्भर है
- सम्यग्दर्शन का प्रकार – औपशमिक, क्षयोपशमिक, क्षायिक - संयम की स्थिति – गृहस्थ, देशव्रती, पूर्ण मुनि, श्रेणी चढ़ने की क्षमता - कषायों की तीव्रता – मन्द, मध्यम, तीव्र - कर्मों का पूर्व सन्चय (आयु, नाम, गोत्र, वेदनीय आदि)
इसलिए केवल इतना कहना कि “इच्छा मध्यम है या तीव्र है” – यह अकेला मानक नहीं बनता; यह तो एक बड़ा सहायक कारण है।
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(ख) व्यावहारिक परम्परागत कथन (परम्परा की सीख, न कि कठोर गणित)
परम्परा में आचार्यों ने “समीप–भव्य / दूर–भव्य” आदि की चर्चा करते हुए व्यावहारिक रूप में समझाया है:
- निकट भव्य (तीव्र समवेग, दृढ़ सम्यग्दर्शन, शीघ्र संयम) –
- दूर भव्य (मध्यम समवेग) –
कई टीका–कारों / आचार्य–कृतों की लोकव्यवहार वाली व्याख्याओं में आप यह सुनेंगे:
- तीव्र साधना / तीव्र समवेग – कम भवों (जैसे ३–५ आदि) में मोक्ष
- जघन्य साधना / मन्द–मध्यम समवेग – ज्यादा भवों (जैसे ५–१५ आदि) में मोक्ष
यह संख्या मुख्यतः उदाहरण और प्रेरणा के लिए दी जाती है, ताकि साधक समझ सके कि:
> “जितना समवेग और निर्वेद तीव्र, उतना मोक्ष–मार्ग संक्षिप्त।”
पर इसे गणित की कठोर सीमा नहीं मानना चाहिए – वास्तविकता में तो:
- किसी एक जीव के लिए यह संख्या उसके विशेष कर्म–बंध और मार्ग पर निर्भर होती है।
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(ग) निश्चित सीमा क्या है?
आगमिक परम्परा (विशेषकर करणानुयोग, कर्मग्रन्थ आदि) से सम्यग्दृष्टि जीव के बारे में दो बातें स्पष्ट मिलती हैं:
- सम्यग्दर्शन के बिना – मोक्ष नहीं।
कितनी भी तपस्या हो, पर यदि दर्शन–मोहनीय शुद्ध नहीं हुआ, तो मोक्ष सम्भव नहीं।
- सम्यग्दर्शन होने के बाद – अनन्त भव नहीं, सीमित भव।
– कितने? यह ऊपर बताई गयी अनेक स्थितियों पर निर्भर है, पर दिशा साफ़ है: - तीव्र समवेग + संयम + कषाय–क्षय → भव बहुत कम हो सकते हैं - मध्यम समवेग + धीरे‑धीरे संयम, कषाय थोड़ा प्रबल → भव अपेक्षाकृत अधिक, पर फिर भी सीमित
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3. आपके प्रश्न पर सीधा उत्तर (सरल भाषा में)
- “मध्यम इच्छा + मोक्ष की लालसा”
- इसका मतलब: सम्यग्दर्शन या उसकी तैयारी की दशा हो सकती है, पर वैराग्य अभी डगमग है। - ऐसा जीव मोक्ष का अधिकारी है, पर उसे अभी - कषाय कम करने, - संयम बढ़ाने, - और समवेग–निर्वेद को स्थिर करने के लिए कई जन्मों की साधना और शुद्धि करनी पड़ सकती है।
- “मोक्ष के लिए तीव्र समवेग / निर्वेद”
- इसका मतलब: यदि यह भाव सच्चे सम्यग्दर्शन के साथ जुड़ जाए, तो - जीव का मार्ग बहुत तेज़ हो जाता है, - शीघ्र संयम, श्रेणी–चरण आदि की सम्भावना बढ़ जाती है, - और वह बहुत कम भवों में (कभी‑कभी उदाहरण के रूप में २–३ या कुछ ही) में मोक्ष तक पहुँच सकता है।
- कितने “exact” भव?
- आगम कोई fix “संख्या तालिका” नहीं बांधते, केवल यह बताते हैं कि - मिथ्यादृष्टि को मोक्ष नहीं, - सम्यग्दृष्टि को अवश्य, - और भाव जितना तीव्र और शुद्ध, मार्ग उतना संक्षिप्त। - अतः “मध्यम बनाम तीव्र इच्छा” के आधार पर एक ही निश्चित भव–संख्या बताना शास्त्रीय रूप से ठीक नहीं है; यह बहुत सारे अन्य कारणों पर भी निर्भर है।
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4. साधक के लिए सार
- समवेग (मोक्ष की तीव्र चाह) और निर्वेद (संसार से ऊब) –
- जितना यह भाव गहरा और स्थिर होगा
- परन्तु केवल “इच्छा की मात्रा” से भव गिनना उचित नहीं;
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मोक्ष की तीव्र चाह और संसार से गहरी ऊब – यह बहुत महान आरम्भ है। इसे सम्यक् श्रद्धा, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र से जोड़कर जितना शुद्ध और स्थिर बनाया जाएगा, उतना ही आपका भव–भ्रमण संक्षिप्त होता जाएगा और मोक्ष निकट आता जाएगा।