Badi shanti ka arth in hindi
‘बड़ी शांति’ (बृहच्छांति / मोटी शांति) एक जैन शांति‑स्तोत्र है, जो विशेष रूप से:
- बड़ी पूजा, प्रतिष्ठा, स्नात्र, यात्राएँ, पर्यूषण आदि के अंत में
- पूरे लोक, श्रमण‑संघ, राजाओं, नगरों और सभी जीवों के कल्याण के लिए
पढ़ा जाता है।
संक्षेप में इसका अर्थ (अर्थ/भावार्थ) इस प्रकार है:
- “भो भो भव्या! श्रुणुत वचनं…”
– हे भव्यो जीवो! जो लोग त्रिभुवन गुरु अरिहंत की भक्ति करते हैं, उन सबकी आरोग्य, लक्ष्मी, धैर्य, सही बुद्धि और दुःखों का विनाश करने वाली शांति हो।
- इंद्र द्वारा जन्माभिषेक और शांति‑घोषणा का वर्णन
– भरत, ऐरावत, विदेह आदि क्षेत्रों में जहां जहां तीर्थंकर हुए हैं, वहाँ उनके जन्म के समय स्वर्ग के इंद्र (सौधर्म इंद्र) घण्टा बजाकर, देवादि के साथ आकर, स्वर्ण पर्वत (कनकाचल) पर जन्माभिषेक कर शांति की घोषणा करते हैं। – मैं भी उसी परंपरा का अनुकरण करते हुए, भव्य जनों के साथ स्नात्र आदि के बाद शांति का उच्चारण करता हूँ – इसे एकाग्र होकर सुनो।
- षोडश विद्याओं और देवों से रक्षा एवं मंगल की प्रार्थना
– सभी विद्या देवियाँ, ग्रह, लोकपाल, ग्राम‑नगर‑क्षेत्र आदि के देवता सब प्रसन्न हों और सबकी रक्षा करें, ऐसा मंगलकामना की जाती है।
- परिवार, मित्र, समाज के लिए शांति
– पुत्र, मित्र, बंधु, परिवार और सभी स्वजन‑सम्बन्धियों के घर‑घर में शांति रहे, उनके सारे अशुभ ग्रह, दुःस्वप्न, आपत्तियाँ दूर हों – ऐसी प्रार्थना की जाती है।
- श्रमण‑संघ, संघ, जनपद और राजाओं के लिए शांति
– - श्री श्रमण‑संघ की शांति हो - जनपदों की शांति हो - राजाओं, राजधानियों, व्यापारियों, नगर‑नायकों और नगरवासियों – सबकी शांति हो - ब्रह्मलोक तक सबकी शांति हो
- अंत में जिनपूजा और जैन शासन की महिमा
– जिनेश्वर की पूजा से सारे उपसर्ग नष्ट होते हैं, विघ्न कटते हैं, मन प्रसन्न होता है। – “सर्व मंगल मांगल्यं… जैनं जयति शासनम्” द्वारा यह बताया जाता है कि सभी धर्मों में कल्याण‑कारी प्रधान धर्म – जैन शासन है, जो परम मंगलमय है।
संक्षिप्त भावना: बड़ी शांति में हम प्रार्थना करते हैं कि –
- हमारे और सभी जीवों के दुःख, विघ्न, रोग, क्लेश नष्ट हों
- घर‑घर, समाज‑समाज में शांति, समृद्धि और सद्बुद्धि बने
- जिनेंद्र, गुरु, धर्म, श्रमण‑संघ, राजा‑प्रजा, सभी देव‑मानव की मंगलमय रक्षा हो
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