Krishna leshiya ke bare me vistar se batayen
Krishna (कृष्ण) लेश्या के बारे में विस्तार से, सरल भाषा में:
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1. लेश्या क्या होती है?
जैन दर्शन में लेश्या आत्मा की “रंगत / अवस्था” है, जो हमारे विचार, भाव, इरादा और आचरण से बनती है।
- जैसे कपड़ा गंदा या साफ़ होता है, वैसे ही
- आत्मा पर कर्मों के कारण एक मानसिक-भावनात्मक रंग चढ़ जाता है – उसे लेश्या कहते हैं।
कुल ६ प्रकार की लेश्याएँ मानी गई हैं:
- कृष्ण (काली)
- नील (नीली)
- कपोत (भूरी/स्लेटी)
- तैजस (लाल)
- पद्म (पीली)
- शुक्ल (सफेद – सबसे उत्तम)
पहली तीन (कृष्ण, नील, कपोत) अशुभ मानी जाती हैं, अंतिम तीन (तैजस, पद्म, शुक्ल) शुभ मानी जाती हैं। ( jainknowledge.com)
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2. कृष्ण लेश्या क्या है?
कृष्ण लेश्या = सबसे नीची / सबसे काली लेश्या यह वह अवस्था है जब मन, वचन और शरीर – तीनों अत्यन्त बुरे भावों से भरे हों।
मुख्य लक्षण
कृष्ण लेश्या वाले व्यक्ति में सामान्यतः ये गुण मिलते हैं:
- अत्यधिक क्रूरता (निर्दयता)
- हिंसा करने की तीव्र प्रवृत्ति – जानबूझकर प्राणियों को दुख देना
- घृणा, द्वेष, बदले की भावना
- तेज़ क्रोध, चिड़चिड़ापन, कटु वाणी
- झूठ, छल, कपट, धोखा देना
- लोभ इतना कि दूसरों का भारी नुकसान भी मंजूर
- ईर्ष्या – दूसरों की उन्नति देखकर जलना, उन्हें गिराने की योजना बनाना
- अपने लाभ के लिए किसी की जान, धन, मान–सब नष्ट करने को तैयार होना
ऐसे भावों से आत्मा पर बहुत भारी पाप बंधता है और आगे के भव में नरक, तिर्यंच (पशु-पक्षी) या अत्यंत दुःखदायी योनि मिलने की संभावना बढ़ती है।
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3. कृष्ण लेश्या को समझने के लिए प्रसिद्ध उदाहरण – फलदार वृक्ष की कथा
जैन कथाओं में ६ मित्र और एक फलदार पेड़ की कहानी से छह लेश्याएँ समझाई जाती हैं ( jainknowledge.com)
छः मित्र जंगल में भूखे-प्यासे भटक रहे थे। उन्हें एक फलदार पेड़ दिखा।
- पहले व्यक्ति ने कहा – “पूरा का पूरा पेड़ ही काट दो, तभी फल मिलेंगे।”
- यह कृष्ण (काली) लेश्या का उदाहरण है। - सोचिए, सिर्फ थोड़े से फल के लिए पूरे पेड़ को नष्ट कर देना – मतलब, अपने छोटे से स्वार्थ के लिए पूर्ण विनाश कर देना। - यही कृष्ण लेश्या की मानसिकता है।
दूसरे–छठे मित्र की सोच धीरे–धीरे कोमल होती जाती है, और आख़िर में छठा मित्र तो सिर्फ गिरे हुए फल ही उठा लेता है – यह शुक्ल लेश्या (सबसे उत्तम) है।
इस कथा से समझना है: जितनी अधिक हिंसक, स्वार्थी और विनाशकारी सोच – उतनी ही कृष्ण लेश्या प्रबल।
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4. कृष्ण लेश्या का आध्यात्मिक परिणाम
कृष्ण लेश्या:
- आत्मा को बहुत गहरे अंधकार की ओर ले जाती है।
- भारी–भारी पाप बंध कराती है।
- सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान की दिशा से बहुत दूर कर देती है।
- ऐसे भावों से व्यक्ति:
जैन दृष्टि से, कृष्ण, नील और कपोत लेश्या – आत्मा की “आध्यात्मिक गिरावट” की निशानी हैं, और मोक्ष मार्ग से बहुत दूर ले जाती हैं। ( jainknowledge.com)
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5. कृष्ण लेश्या उत्पन्न होने के कारण
कृष्ण लेश्या अचानक नहीं आती; धीरे–धीरे आदत बनती है:
- बार–बार क्रोध को उचित मानना – “मैं गुस्सा न करूँ तो लोग चढ़ बैठेंगे।”
- हिंसा से लाभ उठाना – व्यापार, राजनीति या परिवार में दूसरों को कुचलकर आगे बढ़ना।
- दूसरों का दुख देखकर भी मन न पिघलना – संवेदना का न रहना।
- भारी लोभ – ग़लत तरीक़े से धन, पद, सुख पाने की चाह।
- दुष्ट संगति – जिनके साथ रहकर हिंसा, नशा, व्यभिचार, छल-कपट बढ़ता हो।
बार–बार ऐसे भावों को पोसने से आत्मा की “रंगत” काली होती जाती है – यानी कृष्ण लेश्या बनती और मजबूत होती है।
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6. कृष्ण लेश्या से कैसे बचें?
जैन धर्म का मूल प्रयत्न यही है कि अशुभ लेश्याओं से ऊपर उठकर शुभ और अंततः शुक्ल लेश्या तक पहुँचा जाए। इसके लिए:
- अहिंसा की सच्ची साधना
- विचार, वाणी और व्यवहार – तीनों में - किसी को भी चोट पहुँचाने की भावना कम करना
- क्रोध, मान, माया, लोभ पर संयम
- गलती से भी हिंसक या क्रूर प्रतिक्रिया हो जाए तो तुरंत पश्चाताप (प्रतिक्रमण), क्षमा–याचना करना।
- सत्संग और उत्तम साहित्य
- जैन आगम, आचार्य-ग्रंथों का अध्ययन - साधु-साध्वी, ज्ञानी जनों की संगति
- दैनिक प्रार्थना, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय
- अपने दिन का निरीक्षण: “आज मैंने किसके प्रति क्रूर विचार रखा? किसके साथ अन्याय किया?” - यह चेतना ही धीरे–धीरे कृष्ण लेश्या को कम करती है।
- दयालुता और करुणा का अभ्यास
- जहाँ मन कहे “बदला लो”, वहाँ - जैन दृष्टि से देखो: “यह भी कर्मबंध में फँसी आत्मा है” - करुणा–भाव रखने से मन का रंग हल्का होने लगता है।
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7. दिगंबर और श्वेतांबर मत में भेद?
- दोनों परम्पराएँ – दिगंबर और श्वेतांबर –
- नाम, संख्या और मूल अर्थ – ६ लेश्याओं की व्यवस्था – दोनों परम्पराओं में समान रूप से स्वीकृत है। ( jainknowledge.com)
अंतर यदि कहीं आता भी है तो मुख्यतः उदाहरण, कथाओं या छोटे–मोटे विवरण में, पर कृष्ण लेश्या का मूल भाव – “अत्यन्त हिंसक, क्रूर और पापपूर्ण मानसिकता” – दोनो परम्पराओं में समान है।
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संक्षेप में: कृष्ण लेश्या वह स्थिति है जहाँ आत्मा क्रोध, हिंसा, घृणा, बदले और लोभ के घने अंधकार से ढँक जाती है। जैन साधक का लक्ष्य होता है – इन भावों को छोड़कर धीरे–धीरे तैजस, पद्म और अंततः शुक्ल लेश्या की दिशा में आगे बढ़ना।