कृष्ण लेसिया पर कविता
कृष्ण लेस्या पर लघु कविता
कृष्ण लेस्या वह काला रंग है, मन में भर दे क्रोध-भरी ढंग है। दूसरों का दुःख भी सुख लगता, ऐसा अंधा कर्मों का संग है।
कर्म करे वह हिंसा वाले, झूठ, कपट और छल के पाले। ईर्षा, द्वेष से भरा हुआ मन, दुख दे सबको, पाप ही ढाले।
जो भी सोचे – “मैं ही महान”, बाकी सबको समझे अजान। स्वार्थ हेतु सब धर्म भुला दे, ऐसे चित्त की कृष्ण पहचान।
हे जीव, बचा इस काले रंग से, फूटे प्रीति करुणा के संग से। शुभ लेस्यों की ओर बढ़ें हम, राह मिले मोक्षधाम के ढंग से।
यदि चाहो तो मैं इसी विषय पर एक और, थोड़ी बड़ी कविता भी रच सकता हूँ या इसे दोहा/चौपाई के रूप में बदल सकता हूँ।