कृष्ण लेसिया को उदाहरण से कैसे समझाएं
कृष्ण लेश्या को बहुत आसान उदाहरण से ऐसे समझ सकते हैं:
- मूल बात – कृष्ण लेश्या क्या है?
- यह सबसे नीची / खराब लेश्या है।
- मन में क्रूरता, हिंसा, घोर द्वेष, बदला, दया का अभाव, झूठ, धोखा – ऐसे भाव हों तो आत्मा कृष्ण (काली) लेश्या से रंग जाती है।
- ऐसे भाव से बहुत भारी पाप कर्म बंधते हैं, नरक‑जैसी गति बनती है।
- फल वाले पेड़ की प्रसिद्ध कहानी से उदाहरण
छः मित्र जंगल में भटके, उन्हें एक फलदार पेड़ दिखा। सबको भूख थी, पर सोच अलग‑अलग थी।
- पहला मित्र बोला:
यही पहले मित्र की मनो‑स्थिति ‘कृष्ण लेश्या’ का उदाहरण है।
इसमें:
- काम इतना: सिर्फ थोड़ा फल चाहिए
- लेकिन उपाय: पूरा पेड़ काट देना (पूर्ण विनाश)
- रोज़मर्रा की ज़िंदगी से और साधारण उदाहरण
(1) बदला लेने की भावना
- किसी ने आपको थोड़ा अपमान किया, आप सोचते हैं:
(2) बेवजह जानवरों को तकलीफ़ देना
- कोई आनंद के लिए जानवरों को मारता, जलाता, काटता, उन पर प्रयोग करता, मज़ाक उड़ाता है।
(3) व्यापार या नौकरी में
- सिर्फ लाभ के लिए लोगों को बर्बाद करने की योजना:
- पहचान कैसे करें कि मन कृष्ण लेश्या की तरफ जा रहा है?
संकेत:
- “सब ख़त्म कर दूँगा, जला दूँगा, बर्बाद कर दूँगा” जैसे विचार बार‑बार आना।
- हिंसा, बदला, कटुता में ही आनंद मिलना।
- सामने वाले की थोड़ी सी गलती पर भी “पूरी ज़िंदगी ख़राब कर देनी है” जैसा भाव।
ऐसे समय समझना चाहिए – आत्मा का रंग ऊपर उठने के बजाय सबसे काली ओर जा रहा है; ऐसे भाव से नरक, तिरींच, दुखद योनि की ओर झुकाव बनता है।
- सुधार कैसे हो? (सिर्फ संकेत)
कृष्ण लेश्या के भाव आते ही:
- रुकना, गहरी साँस, “अहिंसा” और “क्षमा” याद करना।
- “मेरी सोच इतनी कठोर क्यों हो रही है?” ऐसा आत्म‑निरीक्षण।
- नमस्कार महामंत्र, प्रत्याख्यान / प्रायश्चित्त, शांत भाव से समायिक आदि।
धीरे‑धीरे कृष्ण, नील, कपोत जैसे काले रंग से मन ऊपर उठकर तेजो, पद्मा, शुक्ल लेश्या की ओर जा सकता है।
कृष्ण लेश्या को आप हमेशा ऐसे याद रख सकते हैं: “छोटी चीज़ पाने के लिए भी अगर मैं पूरा पेड़ काट देने जैसा विनाशकारी सोचूँ – यह कृष्ण लेश्या का भाव है।”