कृष्ण लेसिया पर दोहा या सूत्र
कृष्ण लेश्या (कृष्ण लेश्या) पर सीधे “कोई प्रसिद्ध दोहा” की परंपरा में रचा हुआ पाठ बहुत कम मिलता है, पर जैन आगमों में कृष्ण लेश्या का वर्णन स्पष्ट रूप से है। पहले संक्षेप में अर्थ, फिर एक छोटा-सा पारंपरिक शैली का सूत्रवत दोहा जैसा पद आपको दे रहा हूँ, जिसे पढ़कर भाव समझना आसान रहे:
१. कृष्ण लेश्या का सरल अर्थ (जैन दृष्टि से)
जैन धर्म में ६ लेश्याएँ बताई गई हैं – कृष्ण, नील, कपोत, तीव्र/तेज, पद्म, शुक्ल। इनमें:
- कृष्ण (काली) लेश्या – सबसे निकृष्ट, सबसे अशुभ मानसिक दशा।
- ऐसे जीव के मुख्य लक्षण:
यह वर्णन भगवती सूत्र आदि आगमों में भावना रूप से मिलता है (श्वेतांबर परंपरा)। दिगंबर आगमों में भी छह लेश्याओं का सिद्धांत समान है, नामों व वर्णन में हल्का भेद मिल सकता है, पर कृष्ण लेश्या सदा ही अत्यंत अशुभ मानी गई है – यह बात दोनों परंपराओं में समान है।
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२. कृष्ण लेश्या की भावना पर एक सरल दोहा (भावार्थात्मक, स्मरण हेतु)
यह दोहा जैन सिद्धांत के अनुसार भाव समझाने के लिए रचा गया है, यह किसी प्राचीन आगम का शाब्दिक उद्धरण नहीं है, पर अर्थ पूरी तरह पारंपरिक जैन-वर्णन पर आधारित है:
> कृष्ण लेश्या ज्यौं घोर तम, राग-द्वेष का धाम। > हिंसा, कपट, क्रूरता, दे भव-भवों में ग्राम॥
सरल अर्थ (अर्थ):
- कृष्ण लेश्या गाढ़े अँधकार जैसी है।
- जहाँ राग-द्वेष का घर हो, वही कृष्ण लेश्या की अवस्था है।
- हिंसा, कपट, क्रूरता आदि भाव इस लेश्या को और गहरा बनाते हैं,
- और ऐसा जीव जन्म-जन्मान्तर के चक्कर (संसार) में घूमता रहता है।
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३. परंपरागत उपदेश जैसा सूत्रात्मक वाक्य
याद रखने के लिए एक और छोटा-सा “सूत्रवत” वाक्य:
> “कृष्ण लेश्या हिंसा-मूल, राग-द्वेष-प्रबल; > जिह बंधे तिह मोक्ष-दूर।”
अर्थ:
- कृष्ण लेश्या हिंसा का मूल है,
- जहाँ प्रबल राग-द्वेष हैं, वहाँ यह लेश्या है,
- जिस जीवा पर यह लेश्या प्रबल है, उसके लिए मोक्ष अत्यन्त दूर है।
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यदि आप विशेष रूप से आगम का मूल संस्कृत/प्राकृत वाक्य चाहें जिसमें लेश्या-वर्णन हो, तो मैं केवल वही पारंपरिक वर्णन देकर, उसका बहुत सरल अर्थ समझा सकता हूँ।