कृष्ण लेसिया पर दोहा
कृष्ण लेश्या (काली लेश्या) जैन दर्शन में सबसे अधम / निकृष्ट लेश्या मानी गई है, जो अत्यधिक अशुभ भावों को दर्शाती है – क्रूरता, घोर राग‑द्वेष, हिंसा, ईर्ष्या, घमंड आदि। आपके लिए कृष्ण लेश्या पर एक सरल दोहा:
दोहा 1 कृष्ण लेश्या काली भई, भरि दें भीतर काल। हिंसा, द्वेष, अभिमान से, बंधे अनन्त विकाल॥
अर्थ (सरल भाषा में) जिस जीव में कृष्ण (काली) लेश्या होती है, उसका अन्तःकरण मानो काला पड़ जाता है। उसमें हिंसा, द्वेष (नफ़रत) और अभिमान (अहंकार) भरे रहते हैं, और ऐसे भावों से वह अनन्तकाल तक दुखद कर्मों में बँधता चला जाता है।
दोहा 2 करुणा, क्षमा, दया तजो, जो रखे मन में रोष। कृष्ण लेश्या चढ़ि जाय है, कटु वचन, कटु दृष्टि दोष॥
अर्थ जो करुणा, क्षमा और दया को छोड़कर मन में क्रोध और रोष रखता है, उस पर धीरे‑धीरे कृष्ण लेश्या चढ़ती है, उसकी वाणी कटु (कड़वी) हो जाती है, और दृष्टि भी दूषित हो जाती है।
यदि चाहें तो मैं इसी विषय पर और दोहे या एक छोटी व्याख्या भी लिख सकता हूँ, जैसे – कृष्ण लेश्या से बचने के उपाय (क्षमा, मैत्री, प्रार्थना, स्वाध्याय आदि)।