अनुमोदना कैसी हो उसके ऊपर स्टोरी
एक छोटी जैन कहानी – “सही अनुमोदना कैसी हो”
एक बार की बात है, एक नगर में दो भाई रहते थे – सिद्धार्थ और सम्यक्।
दोनों ही जैन परिवार से थे, मंदिर भी जाते थे, पण स्वभाव अलग–अलग था।
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१. ऊपर‑ऊपर की अनुमोदना
एक दिन नगर में बड़े भाव से अन्नक्षेत्र लगा। सम्यक् ने तन‑मन‑धन से सेवा की – पानी पिलाना, बर्तन धोना, बिछाना समेटना, सब काम किया।
कार्य के बाद लोग उसकी बहुत सराहना कर रहे थे।
सिद्धार्थ ने भी कहा – “वाह सम्यक्, खूब खूब अनुमोदना! बहुत अच्छा काम किया है तुमने!”
पर उसके मन में चल रहा था – “सब इसकी तारीफ़ कर रहे हैं, मेरी कोई नहीं देखता… अगली बार मैं ज़्यादा बड़ा दान करूँगा, फिर लोग मेरी प्रशंसा करेंगे।”
बाहर से तो उसने “अनुमोदना” कही, पर अंदर से ईर्ष्या, तुलना और स्पर्धा थी। यह सही अनुमोदना नहीं थी, यह तो सिर्फ़ शब्द थे।
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२. भीतर से निकली हुई सच्ची अनुमोदना
कुछ महीनों बाद पर्युषण आया। शहर के एक जैन साधु भगवंत ने प्रवचन में कहा:
> “जब कोई पुण्य करे, > और हम उसके सुखद परिणाम को देखकर > ईर्ष्या की जगह > सच्ची ख़ुशी महसूस करें, > वही अनुमोदना है। > ऐसा करने वाला भी पुण्य में भागीदार बनता है।”
यह सुनकर सिद्धार्थ चुप हो गया। उसे समझ में आया कि वो तो सिर्फ़ “मूँह से अनुमोदना” कर रहा था, मन से नहीं।
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३. परिस्थिति बदली, भाव बदले
कई दिन बाद, नगर में रक्तदान शिविर लगा। इस बार सिद्धार्थ व्यस्त था, वह खुद सेवा करने नहीं जा सका।
शाम को उसने देखा कि सम्यक्, उसकी बहन, और मोहल्ले के कई युवक–युवतियाँ पूरे दिन सेवा करके लौट रहे हैं – थके हुए हैं, पर चेहरों पर अजीब सी शांति और खुशी है।
अंदर से एक आवाज़ आई – “आज मैं कुछ कर न सका, पर इन्होंने कितना अच्छा काम किया… हे जीवादया वाले परमात्मा! इन सबके इस पुण्य कर्म को सफल बनाओ, इनकी आगे की आत्म–प्रगति हो, और मैं भी आगे ऐसा करने की शक्ति पा सकूँ।”
उसने उनके पास जाकर बहुत ही विनम्र भाव से कहा – “आज मैं नहीं आ पाया, पर तुम सब ने जो जीवदया का काम किया, उसकी खूब खूब अनुमोदना करता हूँ। सच में, तुम्हारा हृदय बड़ा है।”
इस बार उसके मन में न कोई जलन, न तुलना, न दिखावा… सिर्फ़ सच्ची प्रसन्नता और सम्मान था।
यह थी सच्ची अनुमोदना।
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४. परिणाम – बिना किए भी पुण्य
उस रात सिद्धार्थ ने अपनी डायरी में लिखा:
> “आज मैंने समझा – > किसी का अच्छा काम देख कर > मन से ख़ुश होना, > उसके पुण्य को देखकर आनंदित होना, > यही अनुमोदना है। > और यह भी पुण्य है, > चाहे मैंने खुद हाथ से काम न किया हो।”
धीरे‑धीरे वह आदत बना लेता है:
- कोई स्वाध्याय करे – तो उसकी अनुमोदना
- कोई नियम ले – उसकी अनुमोदना
- कोई प्रतिमाधारी हो – उसकी अनुमोदना
- कोई अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य का पालन बढ़ाए – उसकी अनुमोदना
उसका स्वभाव बदलने लगा। पहले जहाँ वह ईर्ष्या करता था, अब वहीं पर वह सोचता था – “कम से कम कोई तो अच्छा कर रहा है, मैं उसके साथ नहीं, पर उसकी खुशी में दिल से शामिल तो हो सकता हूँ।”
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५. सीख – अनुमोदना कैसी हो?
इस कहानी से सरल बात समझ में आती है:
- सिर्फ़ मुँह से नहीं, मन से अनुमोदना हो
– “बहुत अच्छा” बोलें, पर भीतर से भी वही भाव हों।
- ईर्ष्या, जलन, स्पर्धा के बिना
– “उसने कर लिया, मैं नहीं कर पाया” की जलन न हो, बल्कि “वाह, इसकी प्रगति हो रही है” की खुशी हो।
- उसके पुण्य से प्रेरणा लो, तुलना मत करो
– “मैं भी आगे ऐसा कर सकूँ” – यह भाव सही है, “मैं इसे पीछे छोड़ दूँ” – यह भाव गलत है।
- अनुमोदना में भी अहिंसा और मैत्री हो
– सबकी उन्नति देख कर मैत्री और मंगल भाव बढ़ें।
- जहाँ भी धर्म, दया, संयम दिखे – वहीं अनुमोदना
– घर में, समाज में, मंदिर में, ऑनलाइन भी… किसी का भी सद्कर्म देखो – मन से कहो: “खूब खूब अनुमोदना।”
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इसी को जैन दृष्टि से अनुमोदना कहते हैं – दूसरे के सद्कर्म में हृदय से आनन्दित होना, और बिना किए भी उस पुण्य में भाव से सहभागी बनना।