अनुमोदना पर विस्तार से लेख
अनुमोदना पर विस्तार से लेख
1. “अनुमोदना” शब्द का मूल अर्थ
संस्कृत/प्राकृत शब्द अनुमोदना (अनुमोदना / अणुमोदणा) का सीधा अर्थ है –
- प्रसन्न होकर स्वीकार करना,
- किसी के सद्कर्म में हर्ष प्रकट करना,
- किसी कर्म के प्रति “हाँ, ठीक है” कहना (आंतरिक सहमति देना)
इसलिए, जैन धर्म में अनुमोदना = किसी के किए हुए कर्म में मन से सहमति / प्रसन्नता / समर्थन व्यक्त करना है।
- यदि वह पुण्य कर्म है → उसकी अनुमोदना करने से हमें भी पुण्य मिलता है।
- यदि वह पाप कर्म है → उसकी अनुमोदना से हमें भी पाप (कर्मबंध) होता है।
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2. तीन प्रकार – कृत, कारित, अनुमोदित
जैन धर्म में कर्मबंध (पाप–पुण्य का बंध) के तीन मुख्य रूप माने गए हैं:
- कृत (कृत) – स्वयं करके
- कारित (कारित) – दूसरों से करवा कर
- अनुमोदित (अनुमोदित) – दूसरों के किए पर सहमति, प्रसन्नता या समर्थन देकर
उदाहरण समझिए:
- यदि कोई हिंसा कर रहा है –
तीनों ही स्थिति में कर्म का बंधन होता है, इसलिए जैन आचार में अनुमोदना को भी बहुत गंभीर माना गया है।
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3. पुण्य में अनुमोदना
इसी प्रकार यदि कोई:
- दान करता है,
- पूजा करता है,
- तप–उपवास करता है,
- स्वाध्याय, जप, समायिक, प्रतिक्रमण करता है,
- अहिंसा, संयम, सेवा, त्याग आदि कर रहा है,
और हम उसके इस सद्कर्म में सच्चे हृदय से प्रसन्न होते हैं, उसे शुभ भाव से प्रोत्साहित करते हैं, तो यह पुण्य की अनुमोदना कहलाती है।
ऐसी अनुमोदना से –
- हमारा मन भी सद्गुणों की तरफ मुड़ता है,
- भीतर ईर्ष्या कम होती है,
- मैत्री, प्रशंसा और प्रेरणा की भावना बढ़ती है,
- और हम भी उस पुण्य में भागीदार बन जाते हैं।
इसलिए “कुब कुब अनुमोदना” जैसा वाक्य प्रचलित है – मतलब: बहुत बहुत हार्दिक प्रसन्नता और शुभ अनुमोदना। आप इस पर और सरल अर्थ यहाँ पढ़ सकते हैं
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4. पाप में अनुमोदना – सूक्ष्म पाप
जहाँ पुण्य की अनुमोदना से पुण्य बनता है, वहीं पाप की अनुमोदना से पाप बनता है।
कुछ साधारण से उदाहरण:
- कोई झूठ बोल रहा है, आप मुस्करा कर “ठीक है, कर ले” जैसा भाव रखते हैं।
- टीवी/मोबाइल पर हिंसा, कुटिलता, भ्रष्टाचार देखकर मन से आनंद लेना।
- कोई व्यापार या राजनीति में छल–कपट कर रहा है और हम कहें – “बहुत स्मार्ट है, ऐसे ही होना चाहिए।”
भले ही हमने प्रत्यक्ष कुछ न किया हो, लेकिन मन से उस पाप का समर्थन कर दिया – इसे ही अनुमोदित पाप कहा गया है।
जैन दृष्टि में – > किया, करवाया, और अनुमोदित – तीनों समान रूप से बंधनकारी हैं इसलिए साधक को पाप की अनुमोदना से भी विशेष सावधान रहना चाहिए।
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5. प्रतिक्रमण में “कृत–कारित–अनुमोदित” की प्रार्थना
दैनिक प्रतिक्रमण, समायिक, क्षमावाणी आदि में हम बार–बार यह भाव लेते हैं –
- जो पाप मैंने किया,
- जो दूसरों से करवाया,
- और जो दूसरों के किए हुए का अनुमोदन किया,
उन सबके लिए – > “मैं मन, वचन, काया से क्षमा चाहता हूँ (मिच्छामी दुक्कडं)।”
यहाँ स्पष्ट बताया जाता है कि – केवल “मैंने जो किया” ही नहीं, बल्कि जो करवाया और जो अनुमोदन किया, वह भी स्वीकार कर पश्चाताप (प्रायश्चित) करना है।
यही कारण है कि जैन धर्म में अनुमोदना का स्थान बहुत गहरा और सूक्ष्म माना गया है।
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6. अनुमोदना का आध्यात्मिक महत्व
- सूक्ष्म अहिंसा
- जब हम हिंसा–पाप की अनुमोदना नहीं करते, - तो हमारा मन भीतर से हिंसा से अलग होता जाता है।
- शुभ संकल्प
- पुण्य–कर्म की अनुमोदना से मन में शुभ संकल्प, सद्भाव, प्रेरक विचार पैदा होते हैं।
- पर–उपकार और प्रोत्साहन
- जो भी कोई अच्छा कार्य कर रहा हो, उसकी सराहना, सहयोग, और मानसिक समर्थन करना – स्वयं में धर्म है। - इससे समाज में सद्गुण फैलते हैं, न कि ईर्ष्या, तिरस्कार या आलोचना।
- आत्म–शुद्धि
- जब हम बार–बार यह देखते हैं – “मैंने कहाँ–कहाँ गलत की अनुमोदना कर दी होगी?” तो भीतर सजगता (अप्रमत्तता) बढ़ती है। - धीरे–धीरे हमारा दृश्य और दृष्टि दोनों पवित्र होने लगते हैं।
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7. व्यवहार में अनुमोदना का उपयोग कैसे करें?
(क) पुण्य की अनुमोदना बढ़ाएँ
- किसी को तप, उपवास, एकासन, पौषध, समायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय आदि करते देखें –
- कोई दान, सेवा, संयम, त्याग कर रहा हो –
(ख) पाप की अनुमोदना से बचें
- कोई गलत कर रहा है –
(ग) डिजिटल जीवन (टीवी–मोबाइल) में सावधानी
- हिंसक, अश्लील, छल–कपट–भरा कंटेंट देखकर आनंद लेना भी अनुमोदित पाप है।
- जैन साधक को यह समझना चाहिए कि –
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8. दिगंबर–श्वेतांबर परम्परा में अंतर
- सिद्धांत –
- शब्द–रूप –
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9. “अनुमोदना” को जीवन में अपनाने का सरल सूत्र
- हर शुभ–कर्म को हृदय से “हाँ” कहो –
- दूसरों का अच्छा देखकर - जलन नहीं, - प्रसन्नता और प्रेरणा रखो।
- हर अशुभ–कर्म को मन से “न” कहो –
- चाहे खुद करो या कोई और करे – - “ये ठीक नहीं है, मैं इसकी अनुमोदना नहीं करता।”
- प्रतिदिन संकल्प
- रात को सोने से पहले, या प्रतिक्रमण के समय – - “आज मैंने किसी भी पाप–कर्म की जो भी अनुमोदना की हो, उसका मैं प्रायश्चित करता हूँ – मिच्छामी दुक्कडं।”
इसी प्रकार, अनुमोदना को सही रूप से समझकर और अपनाकर हम अपना कर्मबंध हल्का कर सकते हैं, और अहिंसा, मैत्री, संयम व मोक्ष–मार्ग की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।