अनुमोदना पर लेख
अनुमोदना पर सरल लेख (जैन दृष्टि से)
1. “अनुमोदना” शब्द का अर्थ
संस्कृत शब्द “अनुमोदना” दो भागों से बना है –- “अनु” = पीछे, साथ
- “मुद” = प्रसन्न होना, खुश होना
अर्थात – किसी के किए हुए काम को देख‑सुन कर मन से प्रसन्न होना, सहमति देना, उसे ठीक मानना – यही अनुमोदना है।
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2. जैन धर्म में अनुमोदना का स्थान
जैन शास्त्रों में पाप (विशेषकर हिंसा) के तीन मुख्य रूप बताए गए हैं:- कृत (करण) – स्वयं करना
- कारित – दूसरों से कराना
- अनुमोदना – किसी और द्वारा किए गए पाप में
- मन से प्रसन्न होना, - उसे सही मानना, - या उसकी प्रशंसा करना।
इन तीनों में पाप बँध का मुख्य कारण भाव (अंदर का भाव) है। इसलिए, जो काम हम स्वयं करें, कराएँ या केवल अनुमोदन करें, तीनों से पाप का बंधन हो सकता है।
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3. अनुमोदना द्वारा पाप कैसे बँधता है?
कुछ सरल उदाहरण:
- कोई व्यक्ति शिकार करने जाए, हम स्वयं न जाएँ, पर कहें –
- कोई चोरी करे या बेईमानी से धन कमाए, और हम कहें –
- कोई गाली दे, झगड़ा करे, और हम दूर से बैठकर हँसे‑खुश हों –
- फिल्मों, वीडियो, गेम्स इत्यादि में हिंसा, अश्लीलता, जुआ, नशा आदि देखकर
निष्कर्ष: हमने अपने हाथ से कुछ न भी किया हो, फिर भी जिस बुरे काम से मन खुश होता है, उसकी अनुमोदना से भी पाप बँधता है।
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4. प्रतिक्रमण में “अनुमोदना” का उल्लेख
श्रावक‑श्राविका जब प्रतिक्रमण करते हैं, तो बार‑बार यह भाव रखते हैं:
> “मैंने यदि किसी को कष्ट दिया हो – > स्वयं करके (कृत), > दूसरों से कराकर (कारित), > या उसकी अनुमोदना करके – > तो उसकी मैं प्रार्थना करता हूँ, क्षमा चाहता हूँ।”
इसका भाव यह है कि: “भगवान! यदि मैंने सीधे‑सीधे पाप न भी किया हो, लेकिन किसी पाप कर्म पर प्रसन्न हुआ हूँ, तो भी वह दोष मेरा ही है। मैं उसे स्वीकार कर के, पछताकर, छोड़ना चाहता हूँ।”
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5. अनुमोदना – पाप में और पुण्य में
“अनुमोदना” शब्द निश्चय से तटस्थ है –
- बुरे काम की अनुमोदना → पाप का कारण
- अच्छे काम की अनुमोदना → पुण्य का कारण
दो स्थितियाँ समझिए:
- पाप की अनुमोदना
- हिंसा, झूठ, चोरी, व्यसन, मांसाहार, क्रूरता आदि देखकर खुश होना, कहना "कोई बात नहीं, सब चलता है" - यह हमें भी उसी पाप में साझेदार बना देता है।
- पुण्य की अनुमोदना (पुण्यानुमोदना)
- कोई स्वाध्याय करे, दया करे, दान दे, संयम ले, पूजा‑पाठ करे, तप करे, तो हम प्रसन्न हों, श्रद्धा करें, उसकी सराहना करें, “अच्छा किया, ऐसे ही करते रहो” – - यह पुण्य की अनुमोदना है, जो अपने‑आप में पुण्य‑बन्ध का कारण बनती है।
इसीलिए कहा जाता है – “अच्छे कार्य का समर्थन भी पुण्य है, बुरे कार्य का समर्थन भी पाप है।”
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6. व्यवहार में अनुमोदना से कैसे बचें?
- बुरे काम पर चुपचाप आनंद न लें
- “कम से कम मैंने तो नहीं किया” – ऐसा सोचकर अंदर‑ही‑अंदर खुश न हों। - मन से भी “यह गलत है” ऐसा निर्णय रखना सीखें।
- सम्भव हो तो नम्रता से रोकें
- सामने वाला सुने तो प्यार से कहें – “ये काम धर्म से, अहिंसा से, मानवीयता से ठीक नहीं है।”
- अगर रोक न सकें, तो मन से असहमति रखें
- डर या स्थिति के कारण मुँह न खोल सकें, पर मन से स्पष्ट रखें – “मैं इसे अच्छा नहीं मानता।”
- धर्म, दया, संयम की अनुमोदना ज़रूर करें
- घर में, समाज में, बच्चों में, मित्रों में जब भी कोई अच्छा काम करे, तुरंत प्रोत्साहन दें। - इससे अपने में भी अच्छे संस्कार और पुण्य बँधता है।
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7. अनुमोदना का आध्यात्मिक संदेश
- आत्मा का बंधन सिर्फ हाथ‑पाँव से किए कर्मों से नहीं,
- इसलिए जैन धर्म सूक्ष्म रूप से सिखाता है कि –
जो साधक
- पाप की अनुमोदना बंद कर दे
- और पुण्य व धर्म की अनुमोदना बढ़ा दे,
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संक्षिप्त सार
- अनुमोदना = किसी कर्म को समर्थित भाव से “हाँ” कहना।
- बुरे कर्म की अनुमोदना = पाप‑बन्ध।
- अच्छे कर्म की अनुमोदना (पुण्यानुमोदना) = पुण्य‑बन्ध।
- जैन साधक को चाहिए कि
यही अनुमोदना की जैन धर्म के अनुसार सरल और व्यावहारिक समझ है।