अनुमोदना पर दोहे
अनुमोदना पर कुछ सरल जैन-भावना वाले दोहे (मैं खुद रच रहा हूँ, ताकि अर्थ स्पष्ट रहे):
1️⃣ परहित पुण्यतिरा तरे, जो हरषे मन मीत । अनुमोदन भाव से, बँधे उसे भी पुण्य अनीत ॥
2️⃣ देख दया–उपवास जो, साधक धीर गंभीर । “खूब खूब अनुमोदना”, बोले अंतर नीर ॥
3️⃣ दूसर की साधन में, जो हर्षाए मन रोज । उसकी भी पुण्यावली, बढ़े अनन्त सरोज ॥
4️⃣ नहि धन देहि न तन सहायता, केवल आनंदान । ऐसी शुद्ध अनुमोदना, करती कर्म क्षयान ॥
5️⃣ पाप कर्म की वृत्ति में, रोके सज्जन प्राण । पुण्य कर्म की अनुमोदना, खोलै मोक्ष द्वारान ॥
इन दोहों का मुख्य भाव (जैन दृष्टि से):
- जो भी अन्य व्यक्ति धर्म‑साधना, दान, उपवास, जप‑तप, सेवा आदि पुण्य कार्य करे,
- हम ईर्ष्या छोड़कर, हर्ष और प्रशंसा से उसका “अनुमोदन” करें,
यदि चाहें तो मैं इन्हीं भावों को और भी सरल या बच्चों के लिए उपयुक्त ढंग से लिख सकता हूँ।