किसकी अनुमोदना नहीं करनी चाहिए
जिनकी अनुमोदना (समर्थन / प्रसंसा) नहीं करनी चाहिए, जैन धर्म के अनुसार संक्षेप में:
- हिंसा की अनुमोदना
- किसी को मारना, पीटना, काटना, जहर देना, जानवर‑पक्षी की हत्या इत्यादि - “मैं खुद न करूँ, पर जो कर रहा है, अच्छा कर रहा है” – ऐसा सोचना या कहना भी अनुमोदना कहलाता है।
- झूठ, धोखा और कपट की अनुमोदना
- झूठ बोलने वाले, चालाकी से लोगों को ठगने वाले, गलत काग़ज़ बनवाने वाले - “अच्छा किया, बहुत स्मार्ट काम किया” इस तरह खुश होना भी पाप में भागी बनाता है।
- चोरी और अनुचित लाभ की अनुमोदना
- चोरी, घूस, मिलावट, कालाबाज़ारी, किसी की वस्तु, समय या हक़ छीनने वाले - ऐसे काम करने वालों की तारीफ़, समर्थन, या अंदर‑ही‑अंदर प्रसन्न होना भी नहीं करना चाहिए।
- कामी‑व्यसनी आचरण की अनुमोदना
- नशा, जुआ, व्यभिचार, अश्लीलता, व्यर्थ विषय‑भोग की प्रशंसा - “ज़िन्दगी है, मौज करो” कहकर दूसरों को और बढ़ावा देना भी अनुमोदना है।
- क्रोध, हिंसक बदला और द्वेष की अनुमोदना
- बदला लेने, लड़ाई भड़काने, गाली‑गलौज, आतंक, दंगे आदि को सही ठहराना - “ठीक किया, इसे तो ऐसा ही चाहिए था” कहकर संतोष करना भी पाप में साझेदारी है।
- मिथ्यादृष्टि और धर्म‑विरोध की अनुमोदना
- आत्मा, कर्म, अहिंसा, संयम आदि को मज़ाक बनाना या हल्का मानना - जो धर्म‑मार्ग का अपमान कर रहे हों, उनकी हाँ‑में‑हाँ मिलाना भी उचित नहीं।
क्यों नहीं करनी चाहिए अनुमोदना?
जैन आगमों के अनुसार,
- स्वयं करके,
- दूसरे से करवाकर,
- और करते हुए की अनुमोदना करके
तीनों से समान प्रकार का पाप‑कर्म बंध होता है। इसलिए:
- न खुद पाप करें,
- न किसी से करवाएँ,
- और न ही किसी के पाप की अंदर या बाहर से तारीफ़ / खुशी / समर्थन करें।
यही सच्ची अहिंसा और संयम की भावना है।