Girnar tirth ki jatra se bhayankar paap ki bhi nirjara hoti hai ? Esa kisne aagam main likha hai
संक्षेप में उत्तर:
ऐसा “स्पष्ट वाक्य” – कि “Girnar tirth ki yatra se bhayankar paap ki bhi nirjara hoti hai” इस प्रकार शब्दशः किसी मूल आगम (अंग‑उपांग आदि) में नहीं मिलता।
क्या आगम में गिरनार का वर्णन है?
- श्वेताँबर परम्परा के अनुसार गिरनार (उज्जयन्तगिरि / रैवतगिरि / नेमिनाथ पर्वत) का उल्लेख आगम‑कालेन ग्रन्थों में आता है, विशेष रूप से आचारांग आदि में, जहाँ इसे तप, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्षस्थली के रूप में बताया गया है, न कि इस तरह के वाक्य के रूप में कि “यात्रा से भयंकर पाप की निरjara हो जाती है।”
- तत्त्व की दृष्टि से निरjara (कर्मों का क्षय) का सिद्धान्त तो पूरे जैन दर्शन में मान्य है, पर वह तप, संयम, साधना, ध्यान आदि से होता है – किसी विशेष “एक वाक्य” के रूप में गिरनार‑यात्रा जोड़कर आगम में नहीं लिखा गया है।
यह वाक्य कहाँ से चला होगा?
- ऐसे वचन प्रायः
- पर इन्हें सीधा “आगम का वचन” कहना शास्त्रानुकूल नहीं है।
जैन सिद्धान्त क्या कहता है?
- जो भी तीर्थ पर जाए, यदि वहाँ
- गिरनार जैसा महान तीर्थ, जहाँ अनन्त मुनियों और भगवान नेमिनाथ ने तप किया, वहाँ साधना करने से उत्तेजक, पवित्र वातावरण के कारण साधक का भाव ऊँचा बनता है, इसलिए आचार्य लोग उसकी “अनन्त महिमा” गाते हैं – पर यह तत्त्वतः आगम‑सिद्ध “निरजरा के कारण‑कारण भाव” के भीतर ही आता है, अलग से कोई नया नियम नहीं।
इसलिए:
- आपके पूछे हुए शब्दों में यह वचन किसी आगम‑ग्रन्थ ने नहीं कहा है।
- यह भावना‑प्रधान, महात्म्य‑शैली की भाषा है, न कि “अंग‑उपांग का शाब्दिक उद्धरण।”
गिरनार तीर्थ के बारे में संक्षिप्त, शास्त्राधारित जानकारी आप यहाँ पढ़ सकते हैं: SHRI GIRNAR TIRTH