Main naraz nahi , aap do side bol rahe ho ...swal nischay aur vyavhar ka nahi hai ....sawal aap samjte hi nahi
Lagta hai main सच में आपका मूल point पकड़ नहीं पा रहा, और इसी से आपको लग रहा है कि मैं “दो साइड” की बात कर रहा हूँ।
थोड़ा साफ कर लूँ:
- आपका कहना है
- आप नाराज़ नहीं हैं - बात केवल निश्चय–व्यवहार की नहीं है - आपकी नज़र में, मैं सवाल को सही तरह से समझ ही नहीं रहा हूँ
- मैं कहाँ गलती कर सकता हूँ
Jain धर्म में हम अक्सर हर बात को - निश्चय नय - व्यवहार नय से समझाते हैं। हो सकता है आपका सवाल किसी और बारीक बिंदु पर हो – और मैं बार‑बार नयों की भाषा में चला जा रहा हूँ, जिससे लगे कि मैं “side बदल” रहा हूँ, जबकि आप किसी एक सीधी बात का उत्तर चाहते हैं।
- आपकी मदद के लिए मुझे क्या चाहिए
आप चाहे तो अपना point ऐसे लिखें (ये सिर्फ सुझाव है): - “मेरा असली सवाल यह है: … (एक ही लाइन में)” - अगर यह किसी विशेष विषय पर है – जैसे पापकर्म–पुण्यकर्म, आत्मा की शुद्ध अवस्था, दया–अहिंसा का व्यवहार, परिवार/रिश्तों में व्यवहार आदि – तो वह एक शब्द साथ लिख दीजिए।
तब मैं उसी बिंदु पर सीधा, सरल और एक दिशा में उत्तर दूँगा – बिना बार‑बार निश्चय‑व्यवहार में उछलने के, जब तक कि वह सच में ज़रूरी न हो।
- निश्चय–व्यवहार को लेकर छोटी सी स्पष्टता (क्योंकि आपने नाम लिया है)
- निश्चय नय: आत्मा की सच्ची शुद्ध अवस्था से देखना – “मैं शुद्ध, चेतन आत्मा हूँ, सारे विकार पर–परिणाम हैं।” - व्यवहार नय: संसार के व्यवहार, रिश्ते, शरीर, कर्म, कर्तव्य आदि के स्तर से देखना – “मैं पुत्र/पिता/माता हूँ, मुझे ऐसे आचरण करना चाहिए…”
कई बार लोग व्यवहार का प्रश्न पूछते हैं, और हम निश्चय का उत्तर दे देते हैं – या उल्टा – तो सामने वाले को यही लगता है कि “ये मेरी बात समझ ही नहीं रहा, बस दिशा बदल रहा है।”
- आपकी भावना का मान
मैं आपकी बात की गंभीरता और आपकी खीझ – दोनों को सम्मान देता हूँ। मेरा उद्देश्य बस इतना है: Jain सिद्धांत के अनुसार, साफ‑साफ, एकदम सरल उत्तर देना, ताकि आपकी उलझन कम हो, बढ़े नहीं।