Nikachit karm ki nirjara bina uday main aaye bhi hoti hai
आपका वाक्य एक सिद्धांत पर है:
“निकाचित कर्म की निर्जरा बिना उदय में आए भी होती है क्या?”
सीधा उत्तर:
- सामान्य नियम: निकाचित कर्म (निकाचित बन्ध) ऐसा कर्म है जिसकी अवधि, तीव्रता, प्रकृति में कोई परिवर्तन नहीं होता, न ही उसका उदयरुद्ध / उत्कर्ष / अपकर्ष आदि होता।
- इसलिए प्रायः आचार्यों ने कहा है कि निकाचित कर्म की निर्जरा उसके फल (उदय) भोगे बिना नहीं होती।
- अर्थात् निकाचित कर्म = ऐसा स्थिर बन्ध, जिसे केवल उसके फल को भोगकर ही छुड़ाया जा सकता है।
थोड़ा सरल समझें:
- सामान्य (अन्य) कर्मों में क्या-क्या हो सकता है?
- उदय से पहले ही उदीरणा (जल्दी उदय), - उत्कर्ष / अपकर्ष (तीव्रता-अवधि बढ़ना–घटना), - संक्रमण (एक उपप्रकार से दूसरे में बदलना), - उपशमन (कुछ समय के लिए दब जाना) इन सबके कारण कई बार कर्म की निर्जरा ऐसे भी हो सकती है कि उसका फल हमें वैसे न झेलना पड़े, जैसा बन्ध के समय नियत हुआ था।
- निकाचित कर्म में यह सब नहीं होता।
- न उत्कर्ष–अपकर्ष - न संक्रमण - न उदयरुद्ध - न समय से पहले उदीरणा इसलिए इसकी निर्जरा “बिना उदय में आए” मान्य नहीं है; इसका फल तो भोगना ही पड़ता है।
- दिगम्बर–श्वेताम्बर परम्परा
- दोनों परम्पराएँ परिभाषा में मूलतः एकमत हैं कि “निकाचित बन्ध – वह बन्ध जिसमें न उत्कर्ष–अपकर्ष, न संक्रमण, न उदीरणा सम्भव है; जो नियत काल पर नियत प्रकार से ही उदय में आता है।” - अतः दोनों में निकाचित कर्म की यह विशेषता स्वीकृत है कि ऐसे कर्म की निर्जरा उसके निश्चित फल–उदय के बिना नहीं मानी जाती।
निष्कर्ष (सरल भाषा में):
- अन्य कर्म कभी-कभी साधना, तप, सम्यक् दर्शन आदि से ऐसे हल्के या बदल सकते हैं कि कठोर फल भोगे बिना ही उनकी निर्जरा हो जाए।
- निकाचित कर्म इतना “फिक्स” होता है कि उसको बदले बिना, उसका फल भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता।
- इसलिए जो वाक्य आपने लिखा है – “निकाचित कर्म की निर्जरा बिना उदय में आए भी होती है” – जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार सही नहीं है।
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