Acharya bhagwant ne hi kaha hai ki nikachit karm ki bhi nirjara ho sakti hai 6th or 7th gunsthan main aatma dhyan se
आपका वाक्य जरा सा “अधूरा‑सा सही” है, उसे स्पष्ट करना ज़रूरी है।
1. निकाचित कर्म क्या है? आगम और आचार्यों के अनुसार निकाचित बंध ऐसा होता है कि:
- उसका उदय पहले या बाद में नहीं कराया जा सकता (उदीरणा नहीं होती),
- उसका स्वरूप बदला नहीं जा सकता (संक्रमण नहीं),
- उसके अवधि और तीव्रता में भी बढ़‑घट नहीं हो सकती (उत्कर्ष / अपकर्ष नहीं),
- वह सिर्फ़ “पूरा भोगकर” ही छुटता है – यही उसकी निर्जरा है।
यही बात संक्षेप में इस प्रकार कही जाती है कि निकाचित कर्म “केवल भोग से ही छूटता है”।
2. फिर 6वें–7वें गुणस्थान पर ‘आत्मध्यान से निकाचित की निर्जरा’ का क्या अर्थ है?
यह बात दो भागों में समझिए:
- निर्जरा तो हर कर्म की अन्तिम अवस्था है
निकाचित सहित सभी कर्म अन्त में छुट ही जाते हैं – यही सिद्धात्मा की अवस्था है। परन्तु निकाचित की निर्जरा सिर्फ़ उसके फल भोगने से ही होती है, उसे हल्का या टाला नहीं जा सकता।
- 6–7वें गुणस्थान पर आत्मध्यान का काम
- यहाँ जीव का सम्यक् दर्शन–ज्ञान पक्का होता है, - राग–द्वेष बहुत कम हो जाते हैं, - साधक शुद्धात्मा में अधिक स्थिर रहता है (आत्मध्यान)।
इसका प्रभाव यह होता है कि:
- ऐसे शुद्ध आत्मध्यान में नए भारी (विशेषकर निकाचित) कर्मों का बंध लगभग रुक जाता है। - जो पुराने निकाचित कर्म उदय में आए हुए हैं, साधक उन्हें - समता से सहता है, - बिना क्रोध, शिकायत, राग‑द्वेष के सहज‑भाव से भोग लेता है।
यही “निर्जरा” है – अर्थात् - निकाचित कर्म रुकता नहीं, - परन्तु साधक उसे शुद्ध भाव से भोगकर समाप्त कर देता है।
3. आपके वाक्य को सही रूप में ऐसे कहना ठीक है
“आचार्य भगवंतों ने कहा है कि निकाचित कर्म की निर्जरा केवल उसके भोग से होती है; 6वें–7वें गुणस्थान पर शुद्ध आत्मध्यान से जीव उस निकाचित कर्म को समता‑पूर्वक सहकर शीघ्र समाप्त कर सकता है, पर उसके स्वरूप या तीव्रता में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता।”
यानी:
- आत्मध्यान निकाचित को ‘रोक’ नहीं देता,
- लेकिन आत्मध्यान से उसे बिना नए पाप बाँधे, समता‑पूर्वक भोगकर छुड़ा दिया जाता है – यही उसकी असली निर्जरा है।
कर्म‑सिद्धांत को सरल भाषा में समझाने वाला एक लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं