चित्रों के माध्यम से अनुमोदना लेख
नीचे “चित्रों के माध्यम से अनुमोदना” विषय पर एक सरल लेख दे रहा हूँ, जिसमें यह भी बताया है कि किस अनुच्छेद के साथ कौन‑सा चित्र बनाया जा सकता है।
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शीर्षक :
“चित्रों के माध्यम से अनुमोदना”जैन धर्म में अनुमोदना का अर्थ होता है – किसी भी अच्छे, धर्मिक और सद्गुणी काम को देखकर मन से प्रसन्न होना, उसकी सराहना करना और उस काम के लिए शुभभाव रखना। जैसे हम कहते हैं – “खूब खूब अनुमोदना” – अर्थात बहुत हृदय से, बहुत आनंदपूर्वक उस पुण्य कार्य के लिए प्रसन्न होना।
चित्र सुझाव: पहले अनुच्छेद के साथ – एक साधारण चित्र बना सकते हैं जिसमें दो बच्चे हों, एक बच्चा दूसरे की अच्छी बात की प्रशंसा कर रहा हो, और दोनों के चेहरे पर मुस्कान हो।
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अनुमोदना – केवल बोलना नहीं, भावना है
जैन दर्शन के अनुसार, कर्म केवल अपने हाथ से करने से ही नहीं, बल्कि दूसरों से करवाने और अनुमोदना करने से भी बँधते हैं। यदि कोई हिंसा, झूठ, चोरी, व्यसन आदि कर रहा है और हम भीतर‑ही‑भीतर सोचें – “अच्छा कर रहा है”, या उसके गलत काम पर आनंद महसूस करें – तो यह पाप की अनुमोदना कहलाती है, जिससे अशुभ कर्म बँधते हैं।
इसी प्रकार, यदि कोई पूजा, स्वाध्याय, दान, संयम, उपवास, जीव‑दया कर रहा है और हम हृदय से खुश होकर कहें – “खूब खूब अनुमोदना” – तो यह पुण्य की अनुमोदना है, जो शुभ कर्म बाँधती है और आत्मा को शुद्धि की ओर ले जाती है।
चित्र सुझाव: यहाँ दो छोटे चित्र बना सकते हैं –
- एक तरफ टीवी पर हिंसा देख कर ताली बजाते लोग (गलत अनुमोदना – इसे आप “गलत” चिन्ह के साथ दिखा सकते हैं)।
- दूसरी तरफ किसी को दान देते हुए, गौशाला/पशु‑पक्षी की सेवा, और पास में खड़ा व्यक्ति प्रसन्न होकर हाथ जोड़कर देख रहा है (सही अनुमोदना – “सही” / टिक चिन्ह के साथ)।
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रोजमर्रा के जीवन में अनुमोदना के उदाहरण
- घर में कोई परिवारजन स्वाध्याय कर रहा हो – हम चुपचाप मोबाइल में खोए रहने की जगह थोड़ा समय निकालकर साथ बैठ जाएँ या कम से कम मन से प्रसन्न हों – यह भी अनुमोदना है।
- किसी ने उपवास, आयंबिल, एकासन किया – हम उसे नीचा दिखाने के बजाय उसकी हिम्मत बढ़ाएँ, “तुमने बहुत अच्छा किया” – यह पुण्य की अनुमोदना है।
- स्कूल/समाज में यदि कोई बच्चा सच्चाई से परीक्षा देता हो, नकल न करता हो – तो उसकी इज्जत बढ़ाना, उसकी सच्चाई पर गर्व करना – यह भी अनुमोदना है।
- कोई प्राणी‑रक्षा करे, दूध‑दही आदि में अहिंसा का ध्यान रखे, या प्लास्टिक न प्रयोग करे – हम भी मन ही मन उसकी सराहना करें – यह भी अनुमोदना है।
चित्र सुझाव: एक बड़ा चित्र बनाइए जिसमें अलग‑अलग छोटे दृश्य हों –
- माँ‑बेटा मिलकर स्वाध्याय कर रहे हैं।
- कोई बीमार को दवा दे रहा है और दूसरा व्यक्ति मुस्कुराकर देख रहा है।
- कोई बच्चा परीक्षा में ईमानदारी से लिख रहा है, और अध्यापक मुस्कुराकर उसे देख रहे हैं।
ऊपर किसी कोने में “खूब खूब अनुमोदना” सुंदर लेखन में लिख सकते हैं।
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अनुमोदना से आत्मा पर प्रभाव
जैन सिद्धांत कहता है कि हमारी भावना के अनुसार कर्म बँधते हैं।
- अशुभ कार्य की अनुमोदना → पापबंध (आत्मा भारी होती है)।
- शुभ कार्य की अनुमोदना → पुण्यबंध (आत्मा हल्की व प्रसन्न होती है)।
इसलिए यदि हम कर्म नहीं भी कर रहे, पर किसी हिंसा, क्रोध, बुराई, अपमान, व्यसन को देखकर अंदर‑ही‑अंदर खुश हो रहे हैं, तो भी यह अच्छा नहीं है। इसके विपरीत हम छोटा सा शुभ काम भी न कर पाएँ, लेकिन जो लोग अच्छा कर रहे हैं, उनकी सच्चे मन से अनुमोदना करें – तो यह भी बड़ा पुण्य बन जाता है।
चित्र सुझाव: आत्मा का प्रतीक एक “दीपक” बनाइए –
- जब बुरी अनुमोदना हो रही है तो दीपक के आसपास काला धुआँ (कर्म) जमा हो रहा है।
- जब अच्छी अनुमोदना हो रही है तो वही दीपक चारों ओर उजाला फैला रहा है।
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निष्कर्ष
चित्रों के माध्यम से हम बहुत सरलता से यह समझ सकते हैं कि –
- गलत काम करने से ही नहीं,
- बल्कि गलत काम को अच्छा मानने से भी
और
- यदि हम अच्छे काम करें, और
- दूसरों के अच्छे काम की सच्चे मन से अनुमोदना करें,
तो हमारे भीतर सद्भाव, प्रसन्नता और आत्मशुद्धि बढ़ती है। जैन धर्म हमें सिखाता है कि “खूब खूब अनुमोदना” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि वह भावना है जो समाज में धर्म, करुणा और अहिंसा का वातावरण बनाती है।
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खासकर “खूब खूब अनुमोदना” के अर्थ के बारे में अधिक पढ़ने के लिए आप यह पृष्ठ देख सकते हैं