Prabhu bhakthi se kisne thirthankar naam karm uparjan kiya
Jainism ke anusar, prabhu bhakti (भगवान की भक्ति) se bhi तीर्थंकर नाम कर्म का उपार्जन (arjan) ho sakta hai. कई कथाओं में उल्लेख मिलता है कि किसी जीव ने भगवान के प्रति अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और सेवा से तीर्थंकर नाम कर्म का बंध किया।
एक प्रमुख उदाहरण राजा मेघरथ का है। राजा मेघरथ ने एक बार एक कबूतर की रक्षा के लिए अपनी ही देह का मांस काटकर दिया था और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखा। इस महान दया और भक्ति के कारण उन्होंने तीर्थंकर नाम कर्म का बंध किया और आगे के भव में वे तीर्थंकर बने।
इसी प्रकार कई अन्य जीवों ने भी भगवान की भक्ति, उनकी पूजा, आराधना, स्तुति, और तीर्थों की सेवा से तीर्थंकर नाम कर्म का बंध किया है। जैन धर्मग्रंथों में ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं।
सारांश: जैन धर्म के अनुसार, प्रबुद्ध श्रद्धा, सच्ची भक्ति, भगवान की सेवा, और उत्तम चारित्र से तीर्थंकर नाम कर्म का उपार्जन संभव है।