Why do we do abhishek in hindi
हम अभिषेक क्यों करते हैं – इसे बहुत आसान भाषा में समझते हैं:
- आत्मिक शुद्धि की भावना के लिए
बाहर से तो हम भगवान की मूर्ति पर जल, दूध आदि चढ़ाते हैं, लेकिन भाव यह होता है कि – “जैसे मैं भगवान को स्नान करवा रहा हूँ, वैसे ही मेरी आत्मा के पाप, क्रोध, मान, माया, लोभ धुल जाएँ।” यानी अभिषेक हमें अंदर से साफ होने की याद दिलाता है।
- तीर्थंकरों के गुणों को याद करने के लिए
तीर्थंकरों ने - अहिंसा, - सत्य, - अपरिग्रह (कम से कम रखना), - क्षमा जैसे महान गुण अपनाए। अभिषेक करते समय हम उनके सामने झुकते हैं और मन में यह लेते हैं कि “मुझे भी ऐसे ही बनना है।”
- अहंकार कम करने के लिए
जब हम अपने हाथों से भगवान के चरणों में जल चढ़ाते हैं, वस्त्र भीगते हैं, झुकते हैं – यह सब हमारे अहंकार को तोड़ने की साधना है। हम मानते हैं कि “मैं छोटा हूँ, भगवान के गुण बड़े हैं।”
- एकाग्रता और भक्ति के लिए
अभिषेक में - मंत्र, - स्तुति, - शांत वातावरण होता है। इससे मन इधर‑उधर की चिंता छोड़कर भगवान पर केंद्रित हो जाता है। यह ध्यान की तैयारी जैसा है।
- त्याग और वैराग्य की स्मृति
दूध, दही, घी आदि जो हम चढ़ाते हैं, वे सब भोग की चीज़ें हैं। इन्हें भगवान पर अर्पण कर के हम यह भाव करते हैं – “सच्चा सुख भोग में नहीं, वैराग्य और मोक्ष के मार्ग में है।”
- संप्रदाय अनुसार थोड़ा भेद
- श्वेतांबर परम्परा में स्त्री‑पुरुष दोनों अभिषेक कर लेते हैं (स्थानीय नियमों के अनुसार)। - दिगंबर परम्परा में कुछ स्थानों पर अभिषेक केवल पुरुष करते हैं, यह शुद्धि और परम्परा के कारण माना जाता है। परंतु दोनों में मूल भावना एक ही है – आत्मशुद्धि और तीर्थंकर भक्ति।
संक्षेप में: अभिषेक कोई “सिर्फ़ नहाना” नहीं है, यह आत्मा को पवित्र बनाने की याद‑दिलाने वाली साधना है, जिससे हम तीर्थंकरों के समान गुणों को अपनाने का संकल्प लेते हैं।