जैन परंपरा का अस्तित्व वैदिक काल मे विद्यमान था । मंत्र सहित उत्तर दे ।
जैन परम्परा के बारे में मूल बात यह है कि – जैन धर्म स्वयं को “अनादि‑अनन्त” (बिना आरम्भ और बिना अन्त) धर्म मानता है। इसलिए जैन दृष्टि से वह किसी “वैदिक काल” से पहले या बाद में शुरू नहीं हुआ, बल्कि सदा‑से चला आता सत्य धर्म है।
1. जैन आगम में धर्म की अनादिता (हमेशा से होने) का सिद्धान्त
जैन ग्रन्थों में स्पष्ट कहा गया है कि धर्म और तीर्थंकरों की परम्परा प्रत्येक कालचक्र में बार‑बार प्रकट होती है, नये सिरे से “बनती” नहीं है। जैसे:
- “धम्मो अनादि‑निद्देसो” – धर्म का उपदेश अनादि है (आरम्भ रहित है)।
- तत्त्वार्थ सूत्र में भी धर्म‑तीर्थंकर आदि का वर्णन ऐसे आता है कि वे लोक में निरन्तर परम्परा से प्रकट होते रहते हैं, किसी एक वेद या किसी ऐतिहासिक काल पर आश्रित नहीं हैं (यह सूक्ति मैं अर्थरूप में कह रहा हूँ, न कि शब्दशः उद्धरण के रूप में)।
इससे जैन मत यह मानता है कि – जब वैदिक परम्परा मानी जाती है, उस समय भी जैन धर्म के तत्त्व (अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह, तप, सम्यक् दर्शन आदि) लोक में विद्यमान थे, बस उपदेशक तीर्थंकर और उनके गणधर उस समय‑समय पर अलग‑अलग नामों / रूपों से हुए।
2. ऋषभदेव (आदिनाथ) और प्राचीन काल
श्वेताम्बर और दिगम्बर – दोनों परम्पराएँ मानती हैं कि:
- भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) वर्तमान के छठे आरा (अवसरपिणी) के प्रथम तीर्थंकर हैं।
- उन्होंने ही पहली बार इस वर्तमान कालचक्र में –
इसलिए जैन मत के अनुसार, ऋषभदेव‑काल, वेदों के रचयिताओं से भी बहुत प्राचीन माना गया है। अर्थात् जैन परम्परा कहती है कि – जबकि ऐतिहासिक‑शोध वेदों को प्राचीन मानते हैं, जैन दृष्टि से ऋषभदेव और जैन तीर्थंकर परम्परा उससे भी पूर्व की है।
3. “वैदिक काल में जैन परम्परा विद्यमान थी” – जैन दृष्टि से सार
जैन सिद्धान्त के अनुसार:
- धर्म अनादि है – किसी ग्रन्थ, किसी ऋषि, किसी युग से शुरू नहीं हुआ।
- प्रत्येक काल में तीर्थंकर प्रगट होते हैं, वे उसी अनादि सत्य धर्म को पुनः‑पुनः प्रकट करते हैं।
- अतः वैदिक काल भी इसी अनादि‑धर्म की निरन्तर धारा के बीच का एक चरण मात्र माना जायेगा –
न कि जैन धर्म उसके बाद का या उससे निकला हुआ कोई अलग नया मत।
इस बात को हमारे नमस्कार‑मंत्र की भावना से भी समझ सकते हैं:
> णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं। > एसो पंच णमोक्कारो, सव्व‑पावप्पणासणो।
अर्थ: मैं अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और समस्त साधुओं को नमस्कार करता हूँ। ये पाँचों नमस्कार सभी पापों का नाश करने वाले हैं।
यहाँ “लोए सव्व‑साहूणं” – सारे लोक के, सभी कालों के साधु–सन्तों की अनन्त परम्परा की ओर संकेत करता है – जो किसी एक काल (जैसे वैदिक) तक सीमित नहीं है।
---
संक्षेप निष्कर्ष:
- जैन धर्म के अनुसार धर्म शाश्वत, अनादि‑अनन्त है।
- तीर्थंकरों की परम्परा हर काल में चलती रहती है, अतः वैदिक काल में भी जैन‑तत्त्व और जैन परम्परा विद्यमान मानी जाती है।
- यह निष्कर्ष इतिहास या दूसरे मतों के आधार पर नहीं, बल्कि जैन आगमिक सिद्धान्त “धर्मो अनादि‑निद्देसो” और तीर्थंकर‑परम्परा के वर्णन पर आधारित है।