Parasnath stotra arth sahit
नीचे प्रसिद्ध “श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र” (कवि – द्यानतराय जी) का पाठ और बहुत सरल अर्थ दिया जा रहा है। (यह भगवान पार्श्वनाथ – 23वें तीर्थंकर – की स्तुति है।)
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(1)
नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं, शतेन्द्रं सु पूजें भजें नाय-शीशं | मुनीन्द्रं गणीन्द्रं नमों जोड़ि हाथं, नमो देव-देवं सदा पार्श्वनाथं ||१||अर्थ: हे पार्श्वनाथ भगवन्! आप मनुष्यों के राजा से भी श्रेष्ठ हैं, नागों (सर्पों) के स्वामी हैं, देवों के इन्द्र से भी ऊँचे हैं, असंख्य इन्द्र आपको नमस्कार करते हैं। मुनियों और गणों (संघ) के भी आप श्रेष्ठ भगवान हैं। हाथ जोड़कर आपको – देवों के भी देव – बार‑बार नमस्कार है।
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(2)
गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुड़ावे, महा-आग तें, नाग तें तू बचावे | महावीर तें युद्ध में तू जितावे, महा-रोग तें, बंध तें तू छुड़ावे ||२||अर्थ: हे प्रभु! आप हाथी से फँसे हुए, सिंह से पीड़ित जीव को छुड़ाते हैं; भयंकर अग्नि से, विषैले नागों से रक्षा करते हैं। भीम शत्रु और बड़े‑बड़े संकटों से विजय दिलाते हैं, भयंकर रोगों और कैद‑बंधन से भी उबारते हैं।
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(3)
दु:खी-दु:ख-हर्ता, सुखी-सुक्ख-कर्ता, सदा सेवकों को महानंद-भर्ता | हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं, विषम डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ||३||अर्थ: जो दु:खी हैं, उनके दु:ख दूर करने वाले; जो सुखी हैं, उनके सुख बढ़ाने वाले; अपने भक्तों को सदा महान आनन्द देने वाले आप ही हैं। यक्ष, राक्षस, भूत‑पिशाच, डाकिनी आदि सब विघ्न‑बाधाएँ आपके प्रभाव से मिट जाती हैं।
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(4)
दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने | महासंकटों से निकारे विधाता, सबे संपदा सर्व को देहि दाता ||४||अर्थ: जो निर्धन हैं, उन्हें धन की प्राप्ति कराते हैं; जिनके पुत्र नहीं, उन्हें भी आप सुशील संतान देते हैं। बड़े‑बड़े संकटों से आप ही छुड़ाते हैं और हर प्रकार की सम्पन्नता और सम्पत्ति देने वाले दाता हैं।
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(5)
महाचोर को, वज्र को भय निवारे, महापौन के पुंज तें तू उबारे | महाक्रोध की अग्नि को मेघधारा, महालोभ-शैलेश को वज्र मारा ||५||अर्थ: भयावने चोरों से, वज्र समान कठोर आपदाओं से भय को मिटा देते हैं; तूफानी आंधी‑तूफान जैसे बड़े संकटों से उबार लेते हैं। तीव्र क्रोध की ज्वाला पर शीतल मेघ की वर्षा हैं, और महान लोभ के पहाड़ को तोड़ देने वाले वज्र के समान हैं।
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(6)
महामोह-अंधेर को ज्ञान-भानं, महा-कर्म-कांतार को द्यौ प्रधानं | किये नाग-नागिन अधोलोक-स्वामी, हर्यो मान तू दैत्य को हो अकामी ||६||अर्थ: गहरा मोह और अज्ञान का अन्धकार आपके ज्ञान के प्रकाश से मिटता है। भीषण कर्म‑वन (कर्मों का जंगल) से निकलने के लिए आप ही मार्ग‑प्रदर्शक दीया हैं। आपने नाग‑नागिन आदि अधोलोक के स्वामियों को भी जीता, दैत्यों का अहंकार तोड़ा, और काम‑वासना से रहित (विजयी) बनकर दिखाया।
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(7)
तुही कल्पवृक्षं तुही कामधेनं, तुही दिव्य-चिंतामणी नाग-एनं | पशू-नर्क के दु:ख तें तू छुड़ावे, महास्वर्ग तें, मुक्ति में तू बसावे ||७||अर्थ: आप ही कल्पवृक्ष हैं, आप ही कामधेनु हैं, आप ही दिव्य चिंतामणि रत्न हैं – सब मंगल देने वाले। पशुयोनि और नरक के दु:खों से आप छुड़ाते हैं, ऊँचे स्वर्गों में और अंत में मोक्ष में विराजमान कराते हैं (ऐसी प्रेरणा और सामर्थ्य देने वाले हैं)।
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(8)
करे लोह को हेम-पाषाण नामी, रटे नाम सो क्यों न हो मोक्षगामी | करे सेव ताकी करें देव सेवा, सुने बैन सो ही लहे ज्ञान मेवा ||८||अर्थ: आप का नाम लोहे को भी सोना और साधारण पत्थर को भी कीमती बना देता है – तो जो आपका नाम जपे, वह मोक्ष‑मार्ग पर क्यों न चले! जो आपकी सच्ची सेवा करता है, उसकी देवता भी सेवा करते हैं; जो आपके वचनों को सुनते‑समझते हैं, वे ज्ञान रूपी अमृत पाते हैं।
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(9)
जपे जाप ताको नहीं पाप लागे, धरे ध्यान ताके सबै दोष भागे | बिना तोहि जाने धरे भव घनेरे, तुम्हारी कृपा तें सरें काज मेरे ||९||अर्थ: जो आपके नाम‑जप में लगे रहते हैं, उन पर पापों का स्पर्श नहीं रहता। जो आपका ध्यान धारण करते हैं, उनके सब दोष‑दुर्गुण दूर होते जाते हैं। हे प्रभु! आपको सही जाने बिना मैंने अनेक जन्मों में भटकन झेली है, अब आपकी कृपा से मेरे सारे काम (आध्यात्मिक कल्याण) सिद्ध हों।
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(10) (दोहा)
गणधर इन्द्र न कर सकें, तुम विनती भगवान् | ‘द्यानत’ प्रीति निहार के, कीजे आप समान ||१०||अर्थ: हे भगवन्! गणधर (आपके मुख्य शिष्य) और इन्द्र देव भी आपकी महिमा का पूरा गुणगान नहीं कर सकते। कवि ‘द्यानत’ आपसे विनती करता है – मेरी भक्ति‑प्रीति को देखकर कृपा कीजिए और मुझे भी अपने समान (सम्यक ज्ञान‑चरित्र, मोक्ष‑मार्ग में अग्रसर) बना दीजिए।
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यह स्तोत्र भगवान पार्श्वनाथ के अनन्त गुणों की वन्दना है और यह विश्वास जगाता है कि – उनके शरण आने पर भय, रोग, बाधा, मोह, क्रोध, लोभ आदि सब घटते हैं, और अंततः आत्मा को मोक्ष‑मार्ग मिलता है।
पार्श्वनाथ स्तोत्र के पाठ के समय भाव रखें: “मैं भगवान के गुणों का स्मरण कर, वैसे ही गुण अपने जीवन में लाना चाहता/चाहती हूँ।”
पार्श्वनाथ स्तोत्र से जुड़ा एक संक्षिप्त मार्गदर्शन आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं