आवश्यक सूत्र के अध्ययन से क्या लाभ है
आवश्यक सूत्र के अध्ययन और भावपूर्वक पाठ से ये मुख्य लाभ होते हैं:
- पाप‑क्षय और प्रायश्चित
प्रतिक्रमण, आलोचना, मिच्छामि दुक्कडं आदि के द्वारा किए हुए पापों की पहचान होती है, उनके लिए सच्चा पश्चाताप होता है, जिससे कर्मों की निर्जरा (क्षय) का कारण बनता है।
- आत्म‑शुद्धि और अंतःकरण की सफाई
सामायिक, कायोत्सर्ग आदि से मन शान्त होता है, क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे कषाय धीरे‑धीरे घटते हैं और आत्मा की निर्मलता बढ़ती है।
- सम्यग्दर्शन–सम्यग्ज्ञान–सम्यक् चारित्र की दृढ़ता
नवकार, चौबीस तीर्थंकर स्तुति, गुरु‑वंदन आदि से सही दृष्टि, सही ज्ञान और सही आचरण की भावना पक्की होती है, जिससे मोक्ष‑मार्ग में स्थिरता आती है।
- अहिंसा, क्षमा और मैत्री की वृत्ति
आवश्यक में मैत्री, प्रमोद, करुणा, माध्यस्थ्य आदि भावनाएँ आती हैं; इनका रोज़ अभ्यास करने से हृदय में अहिंसा, क्षमा, नम्रता और सब जीवों के प्रति सद्भाव बढ़ता है।
- दिनचर्या में धार्मिक अनुशासन
सुबह–शाम आवश्यक करने से जीवन में एक नियमित साधना जुड़ती है; समय का सदुपयोग होता है और चंचलता, आलस्य कम होते हैं।
- संवर और निर्जरा – कर्म बंध कम होना
सावधानता, संयम, स्वाध्याय और ध्यान से नये अशुभ कर्मों का बंध (संवर) रुकता है और पुराने कर्मों की निर्जरा होती है; यही जैन साधना का मूल लक्ष्य है।
- आध्यात्मिक आनंद और मानसिक शांति
भाव से किया गया सामायिक, स्तुति और कायोत्सर्ग गहरी मानसिक शान्ति, आत्म‑आनंद और हलकापन (निर्लेपता) देता है; मन विकारों से हल्का होता है।
संक्षेप में, आवश्यक सूत्र का नियमित, समझ के साथ किया गया अध्ययन – जीवन‑शुद्धि, पाप‑क्षय, गुण‑वृद्धि और मोक्ष‑मार्ग में प्रगति – इन चारों का उत्तम साधन है।