निगोद जीव मरकर पृथ्वीकायिक जीव बन सकता है??
संक्षेप में उत्तर: सीधी तरह “निगोद से मरते ही पृथ्वीकायिक” बन जाना आमतौर पर नहीं कहा जाता, लेकिन सिद्धान्त रूप से निगोद जीव आगे चलकर पृथ्वीकायिक (मिट्टी‑पत्थर आदि में रहने वाले) जीव तक अवश्य पहुँच सकते हैं।
थोड़ा सरल क्रम समझिए:
- निगोद जीव कौन हैं?
- अत्यन्त सूक्ष्म, असंख्य, एकेन्द्रिय जीव। - समूह में रहते हैं, उनकी आयु और स्थिति बहुत ही निम्न होती है। - दो प्रकार माने जाते हैं: - नित्य‑निगोद – जो अनादि‑अनन्त काल से वहीं रहते हैं, बाहर नहीं आते। - इतरा‑निगोद – जिनमें से कुछ जीव आगे बढ़कर और प्रकार के जन्म ले सकते हैं।
- निगोद से बाहर कैसे आते हैं?
- जब किसी इतरा‑निगोद जीव का पुण्य कर्म उदय में आता है तो वह निगोद की अवस्था छोड़कर आगे का जन्म लेता है। - शास्त्रों में सामान्य क्रम यह माना जाता है कि निगोद से निकलकर पहले वह किसी स्थावर (एकेन्द्रिय) देह में आता है – जैसे वनस्पतिकायिक (पौधों में), फिर क्रमशः पृथ्वीकायिक, अप्कायिक, तेजस्कायिक, वायुकायिक आदि में भी जन्म ले सकता है, यह सब उसके कर्मों के अनुसार है।
- क्या निगोद जीव पृथ्वीकायिक बन सकता है?
- हाँ, सम्भव है, क्योंकि निगोद जीव भी संसार‑पर्यायी आत्माएँ हैं, जो क्रमशः ऊँचे‑नीचे भावों और देहों को धारण कर सकती हैं। - परन्तु यह परिवर्तन एक ही छलाँग में “अभी निगोद, अगला ही क्षण पृथ्वीकाय” – ऐसा सरल रेखीय वर्णन शास्त्रों में नहीं मिलता; बीच की अवस्थाएँ (विशेषकर अन्य स्थावर देह) भी हो सकती हैं। - मुख्य बात: निगोद जीव स्थायी रूप से वहीं फँस कर रहने के लिए नहीं है; इतरा‑निगोद से बहुत‑से जीव ऋजु‑संसारी बनकर आगे विभिन्न जन्म लेते हैं, जिनमें पृथ्वीकायिक अवस्था भी आ सकती है।
- परम्पराओं की दृष्टि (दिगंबर / श्वेतांबर)
- दोनों परम्पराएँ निगोद जीव की मान्यता रखती हैं – कि वे निम्नतम एकेन्द्रिय जीव हैं, जिनमें से कुछ आगे संसार में प्रकट होते हैं। - सूक्ष्म क्रम (पहला जन्म किस‑किस देह में, कितनी अवधि आदि) की व्याख्या ग्रन्थों और आचार्यों के मतानुसार थोड़ी बदल सकती है, पर मूल सिद्धान्त – “निगोद से निकलकर स्थावर‑देह, और आगे चलकर विविध अवस्थाएँ (पृथ्वीकायिक आदि)” – दोनों में स्वीकार है।
इसलिए आपका वाक्य बहुत मोटे अर्थ में सही दिशा में है कि निगोद जीव आगे चलकर पृथ्वीकायिक भी बन सकता है, बस इसे ऐसे समझना चाहिए: “निगोद जीव, कर्मों के अनुसार, निगोद‑अवस्था छोड़कर पहले स्थावर देहों में आता है, और आगे के क्रम में पृथ्वीकायिक आदि विभिन्न देहों को भी धारण कर सकता है।”