दशवैकालिक सूत्र में स्थावर जीवों में चेतना
दशवैकालिक सूत्र के अनुसार भी “स्थावर जीव” पूर्ण रूप से चैतन्य आत्मा ही हैं, बस उनकी चेतना बहुत अधिक आवरण में रहती है। संक्षेप में बात समझिए:
1. स्थावर जीव कौन‑कौन?
दशवैकालिक के 4थे अध्ययन “षट्‑जीव‑निकाय” (छ‑जीव‑निकाय) में वर्गीकरण आता है – एकेन्द्रिय (स्थावर) जीव पाँच प्रकार:- पृथ्वी‑काय – मिट्टी, पत्थर, धातु आदि में रहने वाले जीव
- आप‑काय – पानी में रहने वाले जीव
- तेज‑काय – अग्नि / गर्मी में रहने वाले जीव
- वायु‑काय – हवा में रहने वाले जीव
- वनस्पति‑काय – पौधे, वृक्ष, लता आदि
ये सब एकेन्द्रिय (केवल “स्पर्शेन्द्रिय” वाले) जीव हैं।
2. क्या इन स्थावरों में सचमुच चेतना है?
हाँ, जैन दर्शन और दशवैकालिक – दोनों के अनुसार:- इन सबमें आत्मा (जीव द्रव्य) है
- आत्मा का स्वभाव ही चैतन्य (ज्ञान‑दर्शन वाला) है
- घाती कर्मों के गाढ़े आवरण के कारण उनकी चेतना बहुत मन्द और अव्यक्त है
- फिर भी वे:
इसलिए मिट्टी, पानी, पौधे आदि को सिर्फ पदार्थ मानकर चोट पहुँचाना, जैन दृष्टि से स्पष्ट जीव‑हिंसा है।
3. दशवैकालिक का मुख्य संदेश यहाँ क्या है?
“षट्‑जीव‑निकाय” के माध्यम से साधु‑श्रावक दोनों को यह भावना कराई जाती है कि:- संसार अनन्त तरह के जीवों से भरा है
- जिनको हम जड़ समझते हैं (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति) – उनमें भी जीव‑चेतना है
- अतः आचरण में अत्यन्त सावधानी और अहिंसा रखनी है –
यही कारण है कि जैन धर्म में
- जल छानना,
- धरती को कम से कम खोदना,
- अनावश्यक आग न जलाना आदि नियम इतने जोर से बताए गए हैं –
4. दिगंबर‑श्वेतांबर मत
- स्थावर/त्रस का यह वर्गीकरण, एकेन्द्रिय में चेतना होना, स्पर्शेन्द्रिय होना – इन बातों में दिगंबर और श्वेतांबर – दोनों परम्पराओं का सिद्धान्त एक‑सा है।
- अंतर अधिकतर आगम‑सूत्रों की सूची और भाषा/टीका में है, सिद्धान्त में नहीं।
संक्षेप में: दशवैकालिक सूत्र स्थावर जीवों को पूर्ण “चैतन्य आत्मा” ही मानता है; उनकी चेतना बहुत मन्द और आवृत्त है, पर है अवश्य – इसलिए उन पर होने वाली कोई भी चोट, जैन धर्म में अहिंसा‑व्रत के विरुद्ध मानी जाती है।