उपांगो पर पुर्ववर्ती कार्य का विवरण दे
उपांग आगमों पर “पूर्ववर्ती कार्य” से सामान्यतः यह पूछा जाता है कि – प्राचीन आचार्यों ने इन पर क्या‑क्या ग्रंथ, टीकाएँ या विवेचन किए हैं और उनका संक्षिप्त स्वरूप क्या है। मैं इसे बहुत सरल रूप में बता रहा हूँ (मुख्यतः श्वेतांबर परंपरा के संदर्भ में):
1. पहले उपांगों की सूची (संदर्भ के लिए)
12 उपांग आगम माने जाते हैं:- औपपातिक सूत्र
- राजा‑प्रश्निया (राजा‑प्रज्ञप्ति)
- जीवाजिवाभिगम् (जीवजिवाभिगम)
- पन्नवणा (प्रज्ञापन)
- सूर्यम्पण्णत्ति (सूर्य‑पन्नत्ति)
- जम्बूद्वीप‑पन्नत्ति
- काण्ड‑पन्नत्ति
- निरयावलिओ (नरकावलिया)
- कल्पावतंसिका
- पुप्फियाओ (पुष्पिका)
- पुप्फ‑चूलिआओ (पुष्प‑चूलीका)
- वंहि‑दसाओ (अग्निदशा)
इन पर प्रारम्भिक काल से ही मौखिक परम्परा में भाष्य चलते रहे, बाद में लिखित टीकाएँ बनीं।
---
2. पूर्ववर्ती (प्राचीन) कार्य का सामान्य स्वरूप
- भाषा‑टीकाएँ (भाषा / चूर्णि / भाश्य)
- मूल उपांग प्राकृत (अर्धमागधी, शौरसेनी आदि) में हैं। - बाद में आचार्यों ने चूर्णि (संक्षिप्त व्याख्या), भाष्य (थोड़ी विस्तृत), और आगे चलकर टीका (और अधिक विस्तार) लिखीं। - इनका मुख्य कार्य था – - कठिन प्राकृत शब्दों का अर्थ बताना, - प्रसंग (कहानी/उदाहरण) स्पष्ट करना, - आगम से निकलने वाले आचार‑सिद्धांत समझाना।
- आचारांग, सूत्कृतांग आदि अंगों से समन्वय
- कई पूर्ववर्ती आचार्यों ने यह दिखाया कि उपांगों का विषय पहले के अंग आगम से कैसे जुड़ता है। - जैसे – औपपातिक सूत्र में नरक, देव, मनुष्य आदि के उत्पत्ति‑विचार को आचारांग, सूत्कृतांग के सिद्धान्तों से जोड़ा गया। - जीवजिवाभिगम, जम्बूद्वीप‑पन्नत्ति आदि में जीव‑अजीव, लोक‑आलोक का जो विवेचन है, उसे अन्य आगम‑ग्रंथों से मिलाकर समझाया गया।
- न्यूनाधिक पाठों की तुलना (पाठभेद‑चिन्तन)
- समय के साथ‑साथ उपांग सूत्रों के अलग‑अलग पंथों में पाठ (शब्दक्रम आदि) में थोड़ा‑बहुत अन्तर हो गया। - प्रारम्भिक टीकाकारों ने इन पाठभेदों को चिन्हित कर, कौन‑सा पाठ अधिक प्रमाणिक है, इस पर चर्चा की। - इससे आज हमें अपेक्षाकृत शुद्ध पाठ उपलब्ध है।
- दार्शनिक और तत्त्वचिन्तन
- जम्बूद्वीप‑पन्नत्ति, सूर्यम्पण्णत्ति, काण्ड‑पन्नत्ति, जीवजिवाभिगम जैसे उपांगों में लोक‑रचना और जीव‑तत्त्व अधिक है। - पूर्ववर्ती आचार्यों ने इनका उपयोग करके - सात तत्त्व, - नव‑तत्त्व, - कर्म‑सिद्धान्त, - लोक‑प्रमाण आदि को स्पष्ट किया। - इस प्रकार उपांगों पर लिखा गया प्राचीन कार्य, बाद के दार्शनिक ग्रंथों (जैसे तत्त्वार्थसूत्र आदि) की भूमिका बना।
- आचार‑केन्द्रित व्याख्या (व्यवहार‑धर्म)
- निरयावलिया, कल्पावतंसिका, वंहि‑दसाओ आदि में कथा‑प्रसंग अधिक हैं। - प्राचीन आचार्यों ने इन कथाओं से निकलने वाले आचार‑बोध पर विशेष टीका की – - कौन‑सा आचरण नरक‑गति का कारण है, - कौन‑सा आचरण देव‑गति या मानव‑जन्म में सहायक है, - त्याग, दान, क्षमा, संयम की महिमा आदि।
---
3. परम्परा‑भेद : दिगंबर और श्वेतांबर
- श्वेतांबर परंपरा
- दिगंबर परंपरा
---
4. निष्कर्ष (सरल भाषा में)
- पूर्ववर्ती कार्य का मतलब है –
- इन कार्यों ने:
उपांगों और 45 आगमों की सूची पर सरल परिचय आप यहाँ पढ़ सकते हैं