सुमेर पर्वत के बारे में जानकारी
जैन धर्म में “सुमेरु पर्वत” को “मेरु पर्वत” या “सुदर्शन मेरु” भी कहा जाता है। इसका संक्षिप्त व सरल परिचय इस प्रकार है:
- सुमेरु कहाँ है?
- जैन ब्रह्माण्ड-विज्ञान के अनुसार सुमेरु पर्वत जम्बूद्वीप के बिलकुल मध्य में स्थित है।
- यह पूरे लोक (ब्रह्माण्ड) का “केंद्रीय पर्वत” माना जाता है।
- इसका रूप व संरचना (सार रूप से)
- सुमेरु अत्यन्त ऊँचा, चौड़ा और सममित (चारों ओर से लगभग समान) बताया गया है।
- इसके चारों ओर कई द्वीप, समुद्र और पर्वत-श्रेणियाँ (हिमवान, हेमकूट, निषध, नील आदि) माने गए हैं।
- यह देवों, मनुष्यों और अन्य लोकों के सूक्ष्म संबंध का “आधार केंद्र” है – अर्थात ब्रह्माण्डीय रचना में इसका बहुत महत्व है।
- आध्यात्मिक महत्व
- अनेक जैन ग्रंथों में देवों द्वारा तीर्थंकरों के जन्माभिषेक आदि सुमेरु पर होने का वर्णन मिलता है।
- सुमेरु को “अत्यन्त पवित्र, देव-पूजित और दिव्य” पर्वत माना जाता है।
- यहाँ का वर्णन हमें जैन आगमों, भूगोल-ग्रंथों (जम्बूद्वीप वर्णन आदि) और पुराणों में मिलता है।
- सुमेरु / मेरु नाम का अर्थ
- “मेरु / सुमेरु” का अर्थ है – श्रेष्ठ, उत्तम, दिव्य पर्वत।
- यह केवल भौतिक पहाड़ नहीं, बल्कि जैन दर्शन में ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का केंद्र-स्थम्भ (axis) जैसा अवधारणा-रूप पर्वत है।
- दिगंबर – श्वेतांबर मतभेद
- दोनों परंपराएँ मेरु/सुमेरु को ब्रह्माण्ड के मध्य का पवित्र पर्वत मानती हैं।
- ऊँचाई, माप आदि के सूक्ष्म गणितीय विवरण में कुछ ग्रंथानुसार अंतर मिल सकते हैं, पर मूल धारणा और आध्यात्मिक महत्व समान है।
संक्षेप में: सुमेरु पर्वत जैन ब्रह्माण्ड-विज्ञान का केंद्र, देव-पूजित, तीर्थंकर-संबंधित और अत्यन्त पवित्र पर्वत है, जिसे जम्बूद्वीप के मध्य में स्थित माना जाता है और यह केवल भूगोल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक व दार्शनिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है।