आगमों एवं प्रज्ञापना शूटर में भौगोलिक वर्णन साढ़े पच्चीस आर्य क्षेत्र सारांशिका एवं उपसंहार बनाएँ
सारांशिका
आगमों व प्रज्ञापना सूत्र में ‘साढ़े पच्चीस आर्य क्षेत्र’ का भौगोलिक वर्णन – संक्षिप्त रूप में- जम्बूद्वीप का वर्णन
- जैन आगमों में लोक (संसार) का विस्तृत भूगोल दिया गया है। - मध्य लोक में जम्बूद्वीप नाम का एक विशाल द्वीप बताया है। - जम्बूद्वीप में ही जीवों के आध्यात्मिक उत्थान, तीर्थंकरों के जन्म व मोक्षमार्ग के प्रवर्तन की मुख्य भूमि मानी गई है।
- आर्य क्षेत्र और अनार्य क्षेत्र
- जहाँ धर्म, सदाचार, श्रमण‑संस्कृति, तीर्थंकर परम्परा, सम्यग्दर्शन आदि का अस्तित्व हो, उसे ‘आर्य क्षेत्र’ कहा गया है। - जहाँ ऐसे धर्मोपदेश व साधु‑संस्कृति का अभाव हो, वह ‘अनार्य क्षेत्र’ कहलाता है। - आर्य क्षेत्र वे भाग हैं जहाँ जैन धर्म का शुद्ध आचार‑व्यवहार सम्भव है और तीर्थयात्रा, श्रावक‑आचार आदि का विधान मिलता है।
- ‘साढ़े पच्चीस आर्य क्षेत्र’ का अर्थ (सामान्य धारण)
- प्रज्ञापना सूत्र जैसे आगमों में जम्बूद्वीप के भीतर अनेक देश, जनपद, नगर आदि का वर्णन है। - इन सब में से जहाँ धर्म का प्रवर्तन विशेष रूप से माना गया है, ऐसे आर्य‑भूभागों की कुल संख्या को परम्परा में “साढ़े पच्चीस आर्य क्षेत्र” कहा जाता है। - “साढ़े पच्चीस” का अर्थ है – निश्चित, गणना‑योग्य, लगभग पच्चीस से कुछ अधिक आर्य‑प्रदेश, जहाँ: - तीर्थंकर या कीवलि प्रभु का जन्म या विहार होता है, - सम्यग्दर्शन‑सम्यक्चारित्र की परम्परा बनी रहती है, - श्रावक‑श्राविकाओं के लिए विधिवत् आचार, व्रत, प्रतिमा, तीर्थ आदि का विधान मिलता है।
- आगमिक विशेषताएँ (संक्षेप में)
- इन आर्य क्षेत्रों में - धर्मशासन की स्थापना, - तीर्थों की सृष्टि, - गणधर, श्रुतकेवली, आचार्यादि की परम्परा, - तथा वर्ण, आश्रम, व्रत आदि का वर्णन मिलता है। - अनार्य क्षेत्रों में ऐसा सुव्यवस्थित धर्म‑शासन स्वीकृत नहीं माना जाता, अतः वहाँ से तीर्थयात्रा आदि भी आगमिकरीति से प्रोत्साहित नहीं की गयी।
- दिगम्बर‑श्वेताम्बर संकेत
- दोनों परम्पराएँ जम्बूद्वीप, आर्य‑अनार्य विभाजन और धर्म‑भूमि की मान्यता को स्वीकार करती हैं। - गणना‑पद्धति, नामों व सूक्ष्म भू‑विभागों के वर्णन में दोनों मतों में कुछ अन्तर की चर्चा विद्वत्‑ग्रन्थों में मिलती है, परन्तु मूल भावना – “सीमित, निश्चित, विशेष धर्म‑भूमि” – समान रहती है।
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उपसंहार
आगमों और प्रज्ञापना सूत्र का “साढ़े पच्चीस आर्य क्षेत्र” सम्बन्धी भौगोलिक वर्णन हमें यह सिखाता है कि सम्यक् धर्म‑पालन के लिए केवल जन्म‑स्थान नहीं, बल्कि अनुकूल आध्यात्मिक वातावरण भी अत्यधिक महत्त्व रखता है। जम्बूद्वीप में बताये गये ये आर्य क्षेत्र ऐसे विशेष भू‑भाग हैं जहाँ
- तीर्थंकरों का अवतरण,
- श्रमण‑संघ की परम्परा,
- शास्त्र‑संरक्षण,
- तथा श्रावक‑जीवन का पूर्ण आगमिक विधान
इस प्रकार “साढ़े पच्चीस आर्य क्षेत्र” की परिकल्पना हमें यह जागृति देती है कि मनुष्य‑जन्म तभी सार्थक है जब हम अपने अनुकूल वातावरण का उपयोग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की सिद्धि के लिए करें, न कि केवल भोग‑विलास में नष्ट करें। यही इस आगमिक भौगोलिक वर्णन की आध्यात्मिक सार‑सारांश भावना है।