उपांगों में निहित धार्मिक जीवन एवं प्रमुख धार्मिक आम्नाय (परिव्राजक, वानप्रस्थ वनवासी, आजीवक) पर सारांशिका एवं उपसंहार बनाएँ
सारांशिका : उपांगों में वर्णित धार्मिक जीवन एवं प्रमुख धार्मिक आम्नाय
उपांग आगम (विशेषकर – जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति, समानस्य, प्रज्ञापना आदि) में जैन दृष्टि से उस समय के विभिन्न धार्मिक मार्गों, जीवन‑शैलियों और साधु‑समुदायों का उल्लेख आता है। इन्हीं के आधार पर हम धार्मिक जीवन और प्रमुख आम्नायों को संक्षेप में इस प्रकार समझ सकते हैं:
---
1. उपांगों में उल्लिखित ‘धार्मिक जीवन’ (जैन दृष्टि से)
उपांगों में आदर्श धार्मिक जीवन का मूल आधार है –
- सम्यग्दर्शन – सम्यग्ज्ञान – सम्यक्चरित्र
सच्चे धर्म का आरम्भ सम्यक् दर्शन (सही श्रद्धा) से, फिर सम्यक् ज्ञान (सही समझ) और फिर सम्यक् आचरण (व्रत, संयम) से माना गया है।
- अहिंसा‑प्रधान जीवन
- सभी प्राणियों के प्रति करुणा - जानबूझकर किसी भी जीव को पीड़ा न देना - भोजन, व्यवसाय, आचरण – सब में हिंसा की न्यूनतम भी सावधानी से बचाव
- व्रत और संयम
- श्रावक के लिए – पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत आदि - साधु के लिए – महाव्रत, अपरिग्रह, कड़क अनुशासन, नग्नता (दिगम्बर परम्परा) या श्वेत वस्त्र (श्वेताम्बर परम्परा), एकाभुक्ति / बेहभुक्ति, पदयात्रा आदि
- तप एवं साधना
- बाह्य तप – उपवास, एकासन, अयंबिल, विहार आदि - आभ्यंतर तप – क्षमा, विनय, शौच, स्वाध्याय, ध्यान आदि लक्ष्य – कर्मों का क्षय कर आत्मा को शुद्ध बनाना।
- लोकजीवन में धर्म
- सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह - व्यापार, परिवार, समाज में न्याय, करुणा, संयम अर्थात् जैन धर्म केवल जंगल या मठ तक सीमित न होकर, गृहस्थ के जीवन में भी उतना ही महत्वपूर्ण बताया गया है।
---
2. प्रमुख धार्मिक आम्नायों का संक्षिप्त चित्र (जैन आगमों के अनुसार)
उपांग एवं अन्य आगमों में उस समय प्रचलित कई शमन‑संप्रदायों का वर्णन आता है। जैन दृष्टि से वे बहुतेरे स्थानों पर मिथ्यादृष्टि (विकृत मत) माने गये हैं, परन्तु उनका ऐतिहासिक‑धार्मिक चित्र भी सामने आता है। उनमें से तीन प्रमुख हैं – परिव्राजक, वानप्रस्थ / वनवासी, आजीवक।
---
(क) परिव्राजक (Parivrajaka)
- जीवन‑शैली
- नगर‑नगर घूमने वाले, भ्रमणशील साधु - स्थिर मठ या गुफा में कम रहकर सतत यात्रा - भिक्षाटन द्वारा जीवनयापन, कभी‑कभी विविध मन्त्र‑तन्त्र, श्राद्ध, हवन, यज्ञादि से भी सम्बन्ध
- जैन दृष्टि
- केवल घूमना या घर छोड़ देना ही सच्चा धर्म नहीं माना गया, - जब तक अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह आदि का कड़क पालन न हो, तब तक केवल “परिव्राज्य” (भ्रमण) से मोक्षमार्ग सिद्ध नहीं। इसलिए जैन आगमों में, जहाँ आवश्यक हो, उनके मतों की त्रुटि बताकर जैन संयमी जीवन की श्रेष्ठता स्पष्ट की गई है।
---
(ख) वानप्रस्थ / वनवासी (Vanaprastha, Vanavasi)
- जीवन‑शैली
- जंगलों/वनों में निवास करने वाले तपस्वी - साधारण वस्त्र, फल‑मूल पर जीवन, कुटीर या वृक्ष‑मूल में निवास - इन्द्रिय संयम का कुछ अंश, परन्तु प्रायः गृहस्थ‑संस्कार, अग्निहोत्र, यज्ञ, वेदिक कर्मकाण्ड आदि से भी जुड़ाव रहता था।
- जैन दृष्टि
- वनवास या एकान्तवास को अपने‑आप में मोक्षमार्ग नहीं माना गया। - यदि भीतर सम्यग्दर्शन‑सम्यक्चरित्र न हो, तो केवल जंगल में रहने से भी आत्मा शुद्ध नहीं होती। - जैन मुनि भी प्रायः वन, गिरि, निर्जन स्थानों में रहते हैं, परन्तु वेदिक कर्मकाण्ड से रहित, शुद्ध अहिंसा और तप‑ध्यान पर आधारित होते हैं – यही मूल भेद है।
---
(ग) आजीवक (Ajivika)
- मत एवं जीवन‑शैली
- यह एक अलग श्रमण‑संप्रदाय था, जिसके प्रमुख आचार्य “मक्खलि गोशालक” माने जाते हैं (जिनका उल्लेख जैन और बौद्ध दोनों ग्रन्थों में मिलता है)। - प्रमुख मत – कठोर नियतिवाद (सब कुछ नियति/भाग्य से निश्चित है, पुरुषार्थ का बहुत कम या कोई स्थान नहीं)। - तप, भ्रमण, संयम आदि भी थे, परन्तु दार्शनिक आधार नियति‑प्रधान था, आत्मप्रयत्न से मोक्ष पर उनका जोर कम माना गया है।
- जैन दृष्टि
- जैन सिद्धान्त का मूल – कर्म‑सिद्धान्त और पुरुषार्थ है; आत्मा खुद अपने कर्म करती है और खुद ही शुद्ध भी बन सकती है। - आजीवक मत में “नियतिवाद” के कारण त्याग‑पुरुषार्थ का महत्व घट जाता है, इसीलिए जैन आगमों में इसे मिथ्यादृष्टि कहा गया। - फिर भी इतिहास की दृष्टि से यह उस समय का एक महत्वपूर्ण श्रमण‑संप्रदाय था, जिससे जैन मुनियों के दार्शनिक संवाद और मतभेद वर्णित मिलते हैं।
---
उपसंहार (निष्कर्ष)
- उपांगों में चित्रित धार्मिक जीवन
- व्यक्ति‑केन्द्रित बाहरी रूप (जंगल, भ्रमण, वस्त्र) नहीं, - बल्कि अहिंसा, सम्यग्दर्शन, संयम, व्रत, तप और आत्मशुद्धि को सच्चे धर्म का मूल माना गया है। - गृहस्थ और साधु – दोनों स्तरों पर, व्यवहार से लेकर आन्तरिक भावों तक, धर्म को उतारने की अपेक्षा रखी गयी है।
- विभिन्न आम्नायों के प्रति दृष्टि
- परिव्राजक, वानप्रस्थ/वनवासी, आजीवक आदि – सबको जैन शास्त्र ऐतिहासिक‑वास्तविकता के रूप में स्वीकार करते हैं, - परन्तु जहाँ उनके मत जैन सिद्धान्त (अहिंसा, कर्म‑सिद्धान्त, पुरुषार्थ) से भटकते हैं, वहाँ स्पष्ट रूप से मिथ्यादृष्टि बताकर अंतर दिखाते हैं।
- जैन सन्देश
- केवल घर छोड़ देना, जंगल में चले जाना, या किसी परम्परा के चिह्न धारण कर लेना – इतना भर धर्म नहीं। - सच्चा धार्मिक जीवन वही है जहाँ – - दर्शन सही हो (सम्यग्दर्शन), - ज्ञान सही हो (सम्यग्ज्ञान), - और आचरण शुद्ध हो (सम्यक्चरित्र) – जो अंततः आत्मा को कर्म‑बन्धन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाए।
इसी प्रकार उपांग आगम हमें यह बोध कराते हैं कि अनेक बाह्य मार्गों और संप्रदायों के बीच, जैन धर्म का मार्ग अहिंसा‑प्रधान, तर्कसंगत और आत्म‑उद्धार पर केन्द्रित एक शुद्ध आध्यात्मिक पथ है।