Why we should not eat onion, garlic, potatoes? Can you give me answer of it in hindi?
जैन दृष्टि से प्याज़, लहसुन, आलू (और बाकी कंद‑मूल) न खाने के मुख्य कारण ये हैं:
- अहिंसा (हिंसा कम करना)
- ये सब ज़्यादातर जड़ (root) सब्ज़ियाँ हैं। - जब हम प्याज़, लहसुन, आलू जैसी चीज़ें मिट्टी से निकालते हैं तो पूरा पौधा नष्ट हो जाता है। - साथ में उसकी जड़ों के आसपास रहने वाले असंख्य सूक्ष्म जीव (निगोद आदि) भी नष्ट हो जाते हैं। - ऊपर की सब्ज़ियों (जैसे लौकी, टिंडा, भिंडी आदि) में सिर्फ फल/सब्ज़ी तोड़ने से पौधा ज़िंदा रहता है, इसलिए वहाँ हिंसा तुलनात्मक रूप से कम मानी जाती है।
- अनेन्तकाय / बहु‑जीव पदार्थ
- आलू, प्याज़, लहसुन जैसी जड़ सब्ज़ियों में सूक्ष्म जीवनाधिक्य (बहुत जीव) माने जाते हैं। - एक ही कंद को काटने‑पकाने से अनेक जीवों की हिंसा हो सकती है, इसलिए इनसे परहेज़ रखा जाता है।
- मन और भावों पर असर
- परम्परा से प्याज़‑लहसुन को बहुत तीखे, इन्द्रियों को भड़काने वाले (कषाय बढ़ाने वाले) पदार्थ माना गया है। - जो साधना, शांति, समता, स्वाध्याय में आगे बढ़ना चाहते हैं वे ऐसे तेज स्वाद‑उत्तेजना वाले पदार्थों से बचते हैं ताकि मन शांत रहे।
- दिगम्बर – श्वेताम्बर परम्परा
- दोनों परम्पराएँ मूल सिद्धान्त में सहमत हैं कि अहिंसा बढ़ाने के लिए कंद‑मूल से बचना उत्तम है। - कठोरता/अनुशासन की डिग्री परिवार, क्षेत्र और गुरु‑परम्परा के अनुसार कुछ घट‑बढ़ हो सकती है, पर प्याज़‑लहसुन‑आलू को न खाने की प्रथा दोनों में सामान्य रूप से पाई जाती है।
- व्यवहारिक सार
- जैन धर्म में भोजन सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और कर्म कम करने का साधन माना गया है। - इसलिए जहाँ थोड़ा‑सा भी अधिक हिंसा या भाव‑उत्तेजना हो, उससे यथासम्भव दूर रहने की सावधानी रखी जाती है – इसी सावधानी के कारण प्याज़, लहसुन, आलू आदि से परहेज़ सिखाया गया है।
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