siddha ke gun
सिद्ध के गुण – बहुत सरल रूप में:
जैन धर्म में सिद्ध आत्मा के अनन्त (बहुत‑बहुत) गुण बताए गए हैं, पर मुख्य 8 गुण (अष्ट गुण) ऐसे माने जाते हैं:
- अनन्त ज्ञान (Anant Jñān)
– सिद्ध आत्मा को सबका, सब समय का, बिना किसी बाधा के पूर्ण ज्ञान है। – कोई विषय उनसे छुपा नहीं है।
- अनन्त दर्शन (Anant Darshan)
– अनन्त प्रकार से, बिना रुकावट के, सब द्रव्य‑पर्याय का प्रत्यक्ष साक्षात्कार। – उनकी “दृष्टि” में कोई आवरण नहीं रहता।
- अनन्त चारित्र (Anant Chāritra)
– पूर्ण विराग, कोई राग‑द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ नहीं। – आचरण पूरी तरह शुद्ध, कभी च्युत नहीं होता।
- अनन्त वीर्य (Anant Vīrya)
– अनन्त शक्ति / सामर्थ्य। – पर यह शक्ति केवल आत्मध्यान और अपने स्वभाव में स्थित रहने में लगती है, संसार‑रचना आदि में नहीं।
- अव्याबाध सुख (Avyābādha Sukha)
– ऐसा आनन्द जो किसी भी प्रकार की चिन्ता, दुख, बीमारी, ताप आदि से कभी बाधित नहीं होता। – न टूटता है, न घटता है।
- अक्षय स्थिति (Akṣaya Sthiti)
– सिद्ध अवस्था सदा‑सदा के लिए रहती है, कभी नष्ट नहीं होती। – एक बार सिद्ध बन गए तो जन्म‑मरण का चक्र हमेशा के लिए समाप्त।
- अरूपित्व (Arūpitva)
– शरीर, इन्द्रियाँ आदि कुछ भी नहीं; केवल शुद्ध आत्मा। – इसलिए आकार‑प्रकार से रहित (न पुरुष, न स्त्री, कोई देह नहीं)।
- अगुरुलघुता (Aguru‑Laghutva)
– सभी सिद्ध आत्माएँ गुणों में समान; कोई बड़ी‑छोटी, ऊँची‑नीची नहीं। – सबका दर्जा समान रूप से परम श्रेष्ठ है।
परम्परा (दिगम्बर – श्वेताम्बर)
- दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों परम्पराएँ इन्हीं 8 मुख्य गुणों को सिद्धों का स्वरूप मानती हैं।
- कहीं‑कहीं नाम या क्रम में थोड़ा अन्तर मिलता है, पर अर्थ और आध्यात्मिक भावना समान है।
यदि आप सिद्धशिला, सिद्ध पद या नवपद / सिद्धचक्र के बारे में और पढ़ना चाहें तो सरल लेख उपलब्ध हैं