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    Marriage vidhi in Jainism HINDI

    8 months ago 248

    जैन धर्म में विवाह (विवाह‑संस्कार) को मोक्ष देने वाला कर्म नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन को संयमी और धर्ममय बनाने वाला संस्कार माना गया है। नीचे बहुत सरल “जैन विवाह विधि” (सामान्य रूप, हिन्दी में) दी जा रही है। ध्यान रहे – अलग‑अलग समाज, क्षेत्र, दिगम्बर/श्वेताम्बर परम्पराओं में थोड़ा‑बहुत अंतर हो सकता है।

    ---

    1. विवाह का उद्देश्य (जैन दृष्टि से)

    • दोनों मिलकर अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य (जितना सम्भव), अपरिग्रह आदि व्रतों को पालन करें।
    • एक‑दूसरे की आध्यात्मिक प्रगति में सहायक साथी बनें।
    • जैन संस्कारों के साथ, सरल जीवन, कम दिखावा और कम व्यय रखें।
    • बच्चों को भी जैन धर्म‑संस्कारों में पालें।

    ---

    2. दिगम्बर / श्वेताम्बर – सामान्य बात

    • दोनों परम्पराएँ विवाह को गृहस्थ‑धर्म का आवश्यक संस्कार मानती हैं।
    • मूल भावना एक ही है:
    - धर्ममय, संयमी, सदाचारपूर्ण गृहस्थ जीवन।
    • मंत्र, विधि, पण्डित / गुरु आदि में थोड़ा भेद हो सकता है, पर
    - नवकार‑मंत्र, पंच‑परमेष्ठी की वन्दना, संयम‑केन्द्रित प्रतिज्ञाएँ – सब में समान भावना रहती है।

    ---

    3. विवाह‑पूर्व संक्षिप्त संस्कार (सामान्य रूप)

    परिवार अपनी परम्परा अनुसार कर सकते हैं:

    1. वाग्दान / सगाई

    - दोनों परिवार बैठकर सहमति देते हैं। - नवकार‑मंत्र, मंगलाचरण, साधु‑साध्वियों या गुरु का आशीर्वाद लिया जाता है।

    1. मण्डप / तोरण विदि

    - विवाह‑स्थल पर छोटा‑सा मण्डप, तोरण बाँधते हैं। - जिनेन्द्र भगवान की पूजा / वन्दना, नवकार‑मंत्र, आरती इत्यादि।

    ---

    4. मुख्य विवाह‑विधि (बहुत सरल रूप में)

    (क) मंगलाचरण

    पण्डित / गुरु / परिवार का कोई बड़ा सदस्य:

    • “णमो अरिहन्ताणं…” (नवकार‑मंत्र) बोलता है, सब मिलकर दोहराते हैं।

    नवकार‑मंत्र (संक्षेप में):

    णमो अरिहन्ताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आयरियाणं। णमो उवज्जायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं॥

    फिर छोटा‑सा मंगल श्लोक / स्तवन – जैसे:

    • “वन्दे सिद्धे…” या किसी तीरथंकर प्रभु का स्तवन (जैन परम्परा का हो, अन्य देव‑पूजा न हो)।

    ---

    (ख) वर‑वधू प्रवेश

    • वर (लड़का) और वधू (लड़की) – दोनों जिनप्रतिमा / जिनमन्दिर की ओर मुख करके या मन में स्मरण करके बैठते हैं।
    • दोनों के माथे पर तिलक, माला / वरमाला का आदान‑प्रदान (यदि परिवार की परम्परा हो तो)।

    ---

    (ग) संकल्प (साधारण, जैन भाव से)

    पण्डित / वाचक इस प्रकार भाव रखकर संकल्प करा सकते हैं (भावार्थ):

    > “आज हम अमुक पुत्र अमुक और अमुक पुत्री अमुक का > जैन धर्मानुसार सरल, संयमी, धर्ममय विवाह‑संस्कार कर रहे हैं; > ताकि ये दोनों अहिंसा, सत्य, संयम, अपरिग्रह के साथ > गृहस्थ धर्म का पालन करें और मोक्ष‑मार्ग में प्रगति करें।”

    ---

    (घ) हस्त‑मिलाप / कन्याग्रहण

    • वधू के पिता/अभिभावक, वधू का हाथ वर के हाथ में देते हैं।
    • उस समय नवकार‑मंत्र या कोई छोटा जैन मंगल पाठ बोला जाता है।
    • भावना:
    - “हम अपनी पुत्री को जैन धर्मानुसार आपके सुपुर्द कर रहे हैं, आप दोनों मिलकर धर्म‑पालन करेंगे।”

    ---

    (ङ) जैन भाव वाली “प्रतिज्ञाएँ” (सात / पाँच प्रतिज्ञाएँ – उदाहरण)

    वर‑वधू एक‑दूसरे से और धर्म के सामने ये संकल्प ले सकते हैं (संक्षेप, आप अपनी सुविधा अनुसार रख सकते हैं):

    1. अहिंसा प्रतिज्ञा

    - हम दोनों जीवों के प्रति यथाशक्य अहिंसक व्यवहार रखेंगे, न मांस‑मदिरा, न व्यर्थ हिंसा करेंगे।

    1. सत्य प्रतिज्ञा

    - हम एक‑दूसरे से और सबके साथ यथाशक्ति सत्य बोलेंगे, कपट, धोखा, झूठ से बचेंगे।

    1. अपरिग्रह / सरलता प्रतिज्ञा

    - दिखावा, अत्यधिक खर्च, लोभ‑लालच से दूर रहते हुए साधारण, सादगी‑पूर्ण जीवन जीने का प्रयास करेंगे।

    1. सम्यक‑दृष्टि और धर्म‑पालन प्रतिज्ञा

    - हम पंच‑परमेष्ठी, जिनवाणी, साधु‑साध्वी की वाणी का आदर करेंगे, नियमित पूजा‑स्वाध्याय, पर्युषण आदि में भाग लेंगे।

    1. परिवार / समाज के प्रति कर्तव्य प्रतिज्ञा

    - हम माता‑पिता, गुरुजन, परिवार, समाज की सेवा और आदर करेंगे।

    1. ब्रह्मचर्य‑संयम प्रतिज्ञा

    - विवाह के भीतर भी काम‑इन्द्रियों को संयमित रखेंगे, अन्य किसी के प्रति अनैतिक आकर्षण से बचेंगे।

    1. आध्यात्मिक प्रगति प्रतिज्ञा

    - एक‑दूसरे की आध्यात्मिक उन्नति में बाधा नहीं, बल्कि सहायक बनेंगे (उपवास, स्वाध्याय, साधु‑सत्संग आदि में)।

    इन प्रतिज्ञाओं को पण्डित एक‑एक वाक्य बोलकर, वर‑वधू से “हाँ / तथास्तु / एवम अस्तु” कहलवा सकते हैं।

    ---

    (च) फेरे / प्रदक्षिणा (यदि आपकी परम्परा में हों)

    • कई जैन समाज में फेरे होते हैं, पर जैन दृष्टि से –
    - अग्नि की “देव” की तरह पूजा नहीं करें, - यदि आग हो तो उसे केवल साक्षी मानें, - या बेहतर है कि जिनप्रतिमा / सिद्धचक्र / पंच‑परमेष्ठी के चारों ओर शांत, सरल प्रदक्षिणा लें।

    सरल विधि:

    • वर‑वधू का दुपट्टा / पल्लू बांधा जाता है (गाँठ)।
    • चार या सात प्रदक्षिणा, जिनेन्द्र‑प्रभु / पंच‑परमेष्ठी को साक्षी मानकर।
    • प्रत्येक फेरा पर –
    - नवकार‑मंत्र, - छोटा‑सा मंगल श्लोक, - या संक्षिप्त प्रतिज्ञा (जैसे ऊपर दी हुई) बोली जा सकती है।

    ---

    (छ) आशिर्वाद

    • अंत में सभी बड़े‑बुजुर्ग, गुरु, पण्डित –
    - नवदम्पति पर अक्षत, चावल, फूल (अहिंसक रूप में) डालकर “धर्म, संयम, स्नेह, दीर्घ आयु और आध्यात्मिक प्रगति” का आशीर्वाद देते हैं।
    • यदि साधु‑साध्वी उपस्थित हों, तो उनके चरन‑स्पर्श / वंदन करके
    - उनसे उपदेश और मंगल‑आशीर्वाद लिया जाता है।

    ---

    (ज) क्षमायाचना

    • विवाह के अंत में एक छोटा‑सा भाव:

    > “आज के इस विवाह‑संस्कार में > बोल, चाल, आचरण, व्यवस्था आदि में > कोई भी चूक, अपमान, त्रुटि आदि हो गई हो, > तो हम सब एक‑दूसरे से और प्रभु से क्षमा याचना करते हैं।”

    • इससे मिताई, द्वेष, अहंकार कम होता है और
    - विवाह सच में “धर्म‑संस्कार” बनता है।

    ---

    5. दिखावा और खर्च के बारे में

    जैन धर्म की स्पष्ट भावना:

    • अत्यधिक दिखावा, बाजे‑गाजे, व्यर्थ खर्च, हिंसक भोजन (अंडा, मांस, शराब, रात‑का भोजन आदि) से बचें।
    • विवाह‑मेन्यू भी
    - शुद्ध शाकाहारी, जैन‑नियमों के अनुसार (लहसुन‑प्याज रहित, कम‑से‑कम जीव‑हिंसा) हो।
    • दहेज‑प्रथा, शोषण, असमानता – जैन अहिंसा और अपरिग्रह के बिलकुल विरुद्ध हैं, उनसे दूर रहें।

    ---

    जैन दृष्टि से सच्चा विवाह‑संस्कार वही है, जिसमें:

    • सरलता हो,
    • जैन आचार‑विचार का पालन हो,
    • और दोनों मिलकर आत्मकल्याण की दिशा में जीवन व्यतीत करने का निश्चय करें।

    अधिक विस्तार से पढ़ने के लिए आप यह लिंक देख सकते हैं:

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