Can a Samyagdrishti jeev bind nikachit karma
संक्षिप्त उत्तर: सम्यग्दृष्टि जीव नया निकाचित कर्म बाँध नहीं सकता, लेकिन पहले से बँधा हुआ निकाचित कर्म उसके सम्यग्दृष्टि अवस्था में फल दे सकता है।
अब इसे सरल शब्दों में समझें:
- सम्यग्दृष्टि जीव कौन?
- जिसे सम्यक् दर्शन हो गया है – सही श्रद्धा, सही दृष्टि, जिनवाणी पर अटूट विश्वास। - ऐसा जीव अब मिथ्यात्व (कुसंयक दर्शन) में नहीं रहता।
- निकाचित कर्म क्या है?
- ऐसा कषाययुक्त कर्म जिसका फल भोगना ही पड़ेगा, बीच में उदय टाला नहीं जा सकता। - प्रायः इसे बहुत तीव्र कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) व मिथ्यात्व से बँधे हुए अत्यन्त घातक कर्म के रूप में बताया जाता है।
- नया निकाचित बंध कैसे होता है?
- शास्त्रों में स्पष्ट है कि निकाचित बंध के लिए - गहरी मोहनीयता / मिथ्यात्व - और बहुत तीव्र अनन्तानुबंधी कषाय आवश्यक हैं। - सम्यग्दृष्टि जीव में मिथ्यात्व समाप्त हो चुका होता है। इसलिए वह वैसा तीव्र, घातक, निकाचित बंध फिर से नहीं बाँधता।
- तो फिर सम्यग्दृष्टि को भी इतनी कठोर विपत्ति क्यों आती है?
- क्योंकि पूर्व जन्मों (या पूर्व अवस्था) में, जब वह मिथ्यादृष्टि था, तब उसने निकाचित कर्म बाँध लिया हो सकता है। - वह पुराना निकाचित कर्म अब सम्यग्दृष्टि अवस्था में भी अपने निश्चित समय पर उदय में आ सकता है – जैसे किसी महाव्रती या सम्यग्दृष्टि साधक को भी भयंकर बीमारी, कष्ट, या अपमान झेलना पड़े।
इसीलिए कहा जाता है – - “सम्यग्दृष्टि नया निकाचित कर्म नहीं बाँधता, परन्तु पुराना निकाचित उसे भी भोगना पड़ सकता है।”
- दिगम्बर–श्वेताम्बर दोनों मत में सार एक ही
- दोनों परम्पराओं में सिद्धान्त यही है कि सम्यक्त्व के बाद घोर मिथ्यात्वयुक्त, अनन्तानुबंधी कषाय वाला बंध नहीं होता, इसलिए नया निकाचित बंध भी नहीं होता। - पहले से बँधा हुआ निकाचित कर्म भोगना, यह दोनों में स्वीकार है (कुछ तकनीकी वर्गीकरणों में फर्क हो सकता है, पर मूल भाव यही है)।
निष्कर्ष:
- हाँ, सम्यग्दृष्टि जीव के पास निकाचित कर्म हो सकता है,
- सम्यग्दृष्टि बनने के बाद वह नया निकाचित कर्म नहीं बाँधता;
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