sat bhay in jainism
जैन धर्म में “सात भय (सत् भय)” मनुष्य के भीतर के सात मुख्य डर माने गए हैं। ये हमारे असली आध्यात्मिक विकास में रुकावट बनते हैं।
आगमों (जैसे स्थाणाङ्ग सूत्र, समवायाङ्ग सूत्र) में इनका वर्णन आता है:
- इहलोक भয় (Ihalok-bhaya)
– यह डर कि मेरा यह वर्तमान जीवन खराब हो जाएगा – जैसे: पद, मान–प्रतिष्ठा, परिवार, आराम, शरीर आदि न बिगड़ जाएँ – इसका भय।
- परलोक भয় (Paralok-bhaya)
– यह डर कि अगला जन्म/परलोक खराब हो जाएगा – नरक में जाऊँगा, पौधादी, तिर्यंच आदि नीच गति होगी – ऐसी चिंता।
- आदाना भय / अदान भय (Ādāna-bhaya)
– हानि, चोरी, लूट, धन या सामग्री के छिन जाने का भय – रोज़ी–रोटी न चली जाए, घर–बार न चला जाए – यह डर।
- आकस्मिक भय (Ākasmāt-bhaya)
– अचानक होने वाली दुर्घटना, आपदा का भय – सड़क दुर्घटना, भवन गिरना, भूकंप, अचानक हमला इत्यादि।
- वेदना भय (Vedanā-bhaya)
– दर्द और कष्ट सहने का डर – बीमारी, ऑपरेशन, शारीरिक–मानसिक पीड़ा से घबराना।
- मृत्यु भय (Mṛtyu-bhaya)
– मरने का डर – कब मर जाऊँगा, मौत कैसे आएगी, अकेले मरूंगा आदि विचारों से डरना।
- अश्लोक भय / अपकीर्ति भय (Aśloka-bhaya)
– बदनामी, अपमान, निन्दा का भय – लोग क्या कहेंगे? समाज में नाम खराब हो जाएगा – ऐसा डर।
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परम्परा (दिगम्बर–श्वेताम्बर) के अनुसार
- श्वेताम्बर आगम (जैसे समवायाङ्ग सूत्र) में सातों भय के नाम थोड़े अलग शब्दों से, पर भाव लगभग यही दिए हैं।
- दिगम्बर ग्रन्थ (जैसे समयसार, दर्शनपहुड की टीकाओं आदि में संदर्भ) में भी सात प्रकार के भय का वर्णन मिलता है, और अर्थ लगभग इसी तरह के हैं – वर्तमान जीवन, अगले जन्म, हानि, आकस्मिक घटना, पीड़ा, मृत्यु और बदनामी के डर।
दोनों परम्पराओं में सार यही है कि:
> जो साधक सम्यक् दर्शन–ज्ञान–चारित्र से इन सात डर को धीरे–धीरे शिथिल कर देता है, उसका आत्मविश्वास और वैराग्य दृढ़ होता है, और वह मोक्ष–मार्ग पर स्थिर हो पाता है।
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संक्षेप में, “सत् भय” = हमारे भीतर के 7 मुख्य डर, जिन्हें पहचानकर, सम्यक् दर्शन, तप, स्वाध्याय और आत्म–चिन्तन से कम करना – यही जैन साधना का एक महत्त्वपूर्ण भाग है।