महाकवि को समुद्र के समान आचरण करने के लिए विशाल प्रवाह कैसा होना चाहिए?* बुद्धि जैसे किनारे गुण रूपी रत्नों से भरा समुद्र गुरु शिष्य परंपरा रुपी प्रसाद आदि गुण रूपी लहरे
प्रश्न में “महाकवि” की तुलना “समुद्र” से की गई है। इस रूपक (उपमा) को बहुत सरल भाषा में ऐसे समझ सकते हैं:
- महाकवि का “विशाल प्रवाह” कैसा हो?
- जैसे समुद्र चारों ओर फैला हुआ, गहरा और विशाल होता है, - वैसे ही महाकवि का हृदय, सोच और दृष्टि भी बहुत विस्तृत, उदार और गहरी होनी चाहिए। - वह संकीर्णता, पक्षपात, घृणा या छोटेपन से ऊपर हो। - उसके विचार सबको समेटने वाले और कल्याणकारी हों – लोककल्याण की भावना से भरे हों।
- “बुद्धि जैसे किनारे”
- समुद्र को किनारे (तट) सीमा में रखते हैं, - वैसे ही महाकवि की बुद्धि (विवेक) उसके भावों और कल्पनाओं को सही दिशा देती है। - बिना किनारे का जल बाढ़ बन जाता है, - वैसे ही बिना विवेक की भावना विपरीत दिशा में जा सकती है। - इसलिए महाकवि की बुद्धि मजबूत, संतुलित और धर्मयुक्त हो।
- “गुण रूपी रत्नों से भरा समुद्र”
- समुद्र में मोती, माणिक, रत्न छिपे रहते हैं, - उसी तरह महाकवि के भीतर भी अनेक गुण हों: - विनम्रता - करुणा - सत्यवादिता - अहिंसा की भावना - संयम व सदाचार - जो लोग उसके संपर्क में आएं, उन्हें इन रत्नों जैसा आंतरिक मूल्यवान लाभ मिले।
- “गुरु–शिष्य परंपरा रूपी प्रसाद”
- मंदिर में प्रसाद शुद्ध, पवित्र और बांटने योग्य होता है, - वैसे ही कवि को जो कुछ मिला है वह उसके गुरुओं, परंपरा और शास्त्रों का प्रसाद है। - महाकवि अपने ज्ञान और कला को - गुरुओं के आशीर्वाद से प्राप्त मानता है, - और उसे आगे शिष्यों, समाज, आने वाली पीढ़ियों में विनम्रता से वितरित करता है। - यह निरंतर गुरु → शिष्य → आगे संसार तक चलती धारा है।
- “आदि गुण रूपी लहरें”
- समुद्र की लहरें हमेशा चलती रहती हैं, - उसी तरह महाकवि के गुण, सद्विचार और सत्प्रेरणाएँ भी निरंतर बाहर आती रहें: - उसके शब्दों में शांति की लहर, - करुणा की लहर, - आत्मजागरण की लहर, - संयम की प्रेरणा वाली लहर। - हर रचना किसी न किसी को अंदर से जगा दे, सुधरने की प्रेरणा दे – यह गुण रूपी लहरें हैं।
संक्षेप में समुद्र के समान महाकवि का आचरण ऐसा होना चाहिए:
- हृदय से विशाल
- बुद्धि से संयमित और विवेकी
- अंदर से गुणों के रत्नों से भरपूर
- गुरुओं का कृतज्ञ, परंपरा को आगे बढ़ाने वाला
- और उसकी रचनाएँ ऐसी हों कि लगातार सद्गुणों की लहरें समाज तक पहुँचती रहें।
यही “समुद्र के समान आचरण” और “विशाल प्रवाह” का सार है।