जो केवल अवगुण को ही ग्रहण करें गुण को छोड़ देवे वह कैसे श्रोता है?* मिट्टी के समान जोंक सर्प भैंसा
यह पंक्ति एक उपदेश / दोहा की तरह है, जिसका भाव बहुत सरल है:
“जो श्रोता (सुनने वाला) केवल अवगुण ही पकड़ ले, गुणों को छोड़ दे – वह कैसा श्रोता है? ऐसा श्रोता मिट्टी, जोंक, सर्प और भैंसे जैसा है।”
अर्थ (सरल भाषा में)
- सच्चा श्रोता वह है जो:
- लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं कि:
“मिट्टी, जोंक, सर्प, भैंसा” से तुलना क्यों?
यह चारों उदाहरण जैन आचार-विचार में अक्सर भाव समझाने के लिए आते हैं:
- मिट्टी
- गंदगी, थूक, कूड़ा – सब कुछ बिना भेद के सोख लेती है। - जो श्रोता हर तरह की बुराई, चुगलखोरी, निन्दा को ही जल्दी पकड़ ले, वह मिट्टी जैसा है।
- जोंक (लीच)
- जहाँ लगती है, वहीं से केवल खून (दुष्ट रस) चूसती है। - ऐसा श्रोता जो बातों में से केवल नकारात्मकता ही चूस ले, जोंक जैसा कहलाता है।
- सर्प (साँप)
- शुभ–अशुभ सब को देख कर भी विष ही लिए रहता है, डँसने पर तत्पर। - वैसा ही व्यक्ति जो मन में विष = द्वेष, नफ़रत, आलोचना भर लेता हो।
- भैंसा
- मोटा, जड़, समझ कम, सिर्फ घास–चारा खाने–सोने में लगा, - उसे न कोमलता समझ आती है, न सूक्ष्म बात, न “गुण” की क़दर। - जो श्रोता सूक्ष्म गुण नहीं समझ पाता, बस भारी–भरकम अवगुण ही देखता है, वह भैंसे जैसा है।
जैन दृष्टि से शिक्षा
जैन धर्म में सम्यक् श्रवण (सही ढंग से सुनना) सम्यक् दर्शन–ज्ञान की सीढ़ी है:
- उपदेश हो, प्रवचन हो, या किसी का व्यवहार –
- किसी साधु, श्रावक, या किसी भी व्यक्ति में:
इसलिए इस पंक्ति का सार यह है:
> “जो केवल दोष सुनकर, दोष ही ग्रहण करे और गुणों को छोड़ दे, > वह अच्छा श्रोता नहीं – वह तो मिट्टी, जोंक, सर्प और भैंसे के समान, > मूल्यहीन और अपना ही अहित करने वाला है।
धार्मिक एवं आत्मिक जीवन में हमें गुण-दृष्टि विकसित करनी चाहिए, न कि दोष-दृष्टि।